Class 11 Geography Chapter 9 सौर विकिरण , ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Notes In Hindi

11 Class Geography Chapter 9 सौर विकिरण , ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Notes In Hindi Solar Radiation , Heat Balance and Temperature

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 11
SubjectGeography
Chapter Chapter 9
Chapter Nameसौर विकिरण , ऊष्मा संतुलन एवं तापमान
Solar Radiation , Heat Balance and Temperature
CategoryClass 11 Geography Notes in Hindi
MediumHindi

Class 11 Geography Chapter 9 सौर विकिरण , ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Notes In Hindi जिसमे हम सौर विकरण , ऊष्मा , सन्तुलन एवं तापमान आदि के बारे में पड़ेंगे ।

Class 11 Geography Chapter 9 सौर विकिरण , ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Solar Radiation , Heat Balance and Temperature Notes In Hindi

📚 अध्याय = 9 📚
💠 सौर विकिरण , ऊष्मा संतुलन एवं तापमान 💠

❇️ सौर विकिरण :-

🔹 पृथ्वी की सतह पर ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत सूर्य है । सूर्य अत्यधिक गर्म , गैस का पिण्ड है । इसके पृष्ठ का तापमान 6000 ° सेल्सियस है । यह गैसीय पिण्ड निरन्तर अन्तरिक्ष में चारों और ऊष्मा का विकिरण करता है जिसे सौर विकिरण कहते है ।

❇️ एल्बिडो Albedo :-

🔹 सूर्य से आने वाली सौर विकिरण की 27 इकाईयाँ बादलों के ऊपरी छोर से तथा 2 इकाईयाँ पृथ्वी के हिमाच्छादित क्षेत्रों द्वारा परावर्तित होकर लौट जाती हैं । सौर विकिरण की इस परावर्तित मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहते है । यह परावर्तित मात्रा 49 ईकाई के रूप में होती है ।

❇️ सौर स्थिरांक :-

🔹 पृथ्वी औसत रूप से वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर 1.94 कैलोरी / प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट ऊर्जा प्राप्त करती है । इसे सौर स्थिरांक कहते हैं ।

❇️ कैलोरी :-

🔹 एक ग्राम जल के तापमान को एक डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए प्रयोग में लाई गई उष्मा को कैलोरी कहते हैं ।

❇️ प्लैंक का नियम :-

🔹 प्लैंक का नियम बताता है कि एक वस्तु जितनी गर्म होगी वह उतनी ज्यादा ऊर्जा का विकिरण करेगी और उसकी तरंगदैर्ध्य उतनी लघु होगी ।

❇️ विशिष्ट उष्मा :-

🔹 एक ग्राम पदार्थ का तापमान एक अंश बढ़ाने के लिए जितनी उष्मा की जरूरत होती है , वह विशिष्ट उष्मा कहलाती है ।

❇️ समताप रेखाएं :-

🔹 मौसम मानचित्र पर खींची जाने वाली काल्पनिक रेखाएं जो एक समान तापमान वाले स्थानों को मिलाती हैं । उन्हें समताप रेखाएं कहते हैं । 

❇️ अपसौर Aphelion :-

🔹 सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई को सूर्य से सबसे दूर अर्थात 15 करोड़ 20 लाख किलोमीटर दूर होती हैं । पृथ्वी की इस स्थिति को अपसौर कहते है ।

❇️ उपसौर ( Perihelion ) :-

🔹 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट अर्थात 14 करोड़ 70 लाख किलोमीटर दूर होती है । इस स्थिति को उपसौर कहा जाता है ।

❇️ सूर्यातप :-

🔹 पृथ्वी को सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को सूर्यातप अथवा आगमी सौर विकिरण कहते हैं । यह पृथ्वी पर लघु तरंग दैर्ध्य के रूप में आती है ।

❇️  सूर्यातप तथा तापमान अन्तर स्पष्ट :-

🔹सामान्यतः सूर्यातप व तापमान को पर्यायवाची शब्द समझा जाता है लेकिन इन दोनो शब्दों का भिन्न – भिन्न अर्थ है : 

🔶 सूर्यातप :- 

  • सूर्यातप ऊष्मा है जिससे गर्मी पैदा होती है ।
  • यह पृथ्वी को सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है । सूर्यातप को कैलोरी में मापा जाता है । 
  • यह 1.94 कैलोरी / प्रति वर्ग सेमी . प्रति मिनट है । गर्मी कारण मात्र है । 
  • किसी पदार्थ को गर्मी देने पर उसका तापमान बढ़ता है ।

🔶 तापमान :- 

  • तापमान ऊष्मा से पैदा हुई गर्मी का माप है । 
  • तापमान को थर्मामीटर द्वारा डिग्री सेलिसियस , केलविन , फारेन हाइट में मापा जाता है । 
  • तापमान गर्मी का प्रभाव है । 
  • गर्मी से तापमान बढ़ता है ।

❇️ सूर्यातप को प्रभावित करने वाले कारक :-

🔶 सूर्य की किरणों का झुकाव :- पृथ्वी का आकार गोलाकार होने के कारण सूर्य की किरणें पृथ्वी के धरातल पर पड़ते समय उनका झुकाव अलग – अलग होता है । लम्बवत् किरणें कम क्षेत्रफल पर गिरती है । इसलिए वह इस प्रदेश को अधिक गर्म करती हैं । जैसे – जैसे किरणों के झुकाव का कोण कम होता जाता है । वैसे – वैसे क्षेत्रफल बढ़ता है तथा वह भाग कम गर्म होता है । 

🔶 सूर्यातप पर वायुमंडल का प्रभाव :- वायुमण्डल में मेघ , आर्द्रता तथा धूलकण आदि परिवर्तनशील दशाएँ सूर्य से आने वाले सूर्यातप को अवशोषित , परावर्तित तथा उसका प्रकीर्णन करती हैं । जिससे पृथ्वी पर पहुँचने वाले सूर्यातप में परिवर्तन आ जाता है ।

🔶 स्थल एवं जल का प्रभाव :- सूर्य की किरणों के प्रभाव से स्थलीय धरातल शीघ्रता से और अधिक गर्म होते हैं जबकि जलीय धरातल धीरे – धीरे तथा कम गर्म होते हैं । 

🔶 दिन की लम्बाई अथवा धूप की अवधि :- किसी स्थान पर प्राप्त सूर्यातप की मात्रा दिन की लम्बाई अथवा धूप की अवधि पर निर्भर करती है । ग्रीष्म ऋतु में दिन बड़े होते हैं और सूर्यातप अधिक प्राप्त होता है । इसके विपरीत , शीत ऋतु में दिन छोटे होते हैं और सूर्यातप कम प्राप्त होता है । 

🔶 भूमि की ढाल :- सूर्याभिमुखी ढाल होने पर अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है । जबकि विपरीत ढाल होने पर कम सूर्यातप प्राप्त होता है ।

🔶 सूर्य से पृथ्वी की दूरी :- 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे करीब होती है जबकि 4 जुलाई को सबसे दूर । अतः सूर्यातप भी उसी तरह कम व अधिक प्राप्त होता है ।

❇️ पृथ्वी के गर्म और ठंडा होने के तरीके :-

🔶 चालन :- जब असमान ताप वाले दो पिण्ड एक दूसरे के संपर्क में आते हैं । गर्म पिंड से ठंडे पिंड की तरफ ऊर्जा का प्रवाह होता है जब तक कि दोनों पिंडों का तापमान बराबर न हो जाए । 

🔶 संवहन :- संवहन प्रक्रिया द्वारा वायुमण्डल में क्रमशः लम्बवत् ऊष्मा का स्थानान्तरण होता है । यह प्रक्रिया गैसीय तथा तरल पदार्थों में होती है । यह प्रक्रिया ठोस पदार्थों में नहीं होती । किसी गैसीय या तरल पदार्थ के एक भाग से दूसरे भाग की ओर उसके अणुओं द्वारा ऊष्मा के संचार को संवहन कहते हैं ।

🔶 अभिवहन :- इस प्रक्रिया में ऊष्मा का क्षैतिज दिशा में स्थानान्तरण होता है । मध्य अक्षांशों में होने वाली मौसम की भिन्नताएं अभिवहन के कारण होती है । वायु द्वारा संचालित समुद्री धाराएं भी ऊष्ण कटिबन्धों से ध्रुवीय क्षेत्रों में ऊष्मा का संचार करती है । यह प्रक्रिया ठोस , गैसीय तथा तरल पदार्थों में होती है ।

❇️ पार्थिव विकिरण :-

🔹 सौर विकिरण लघु तरंगों के रूप में पृथ्वी की सतह को गर्म करता है । पृथ्वी स्वंय गर्म होने के बाद वायुमंडल में दीर्घ तरंगों के रूप में ऊर्जा का विकिरण करने लगती है । जिसे पार्थिव विकिरण कहते हैं ।

❇️ पार्थिव विकिरण किस तरह लाभदायक है ?

🔹 यही प्रक्रिया वायुमंडल को गर्म करती है । वायुमण्डलीय गैसें ( ग्रीन हाउस गैसे ) दीर्घ तरंगों को सोख लेती हैं और वायुमंडल अप्रत्यक्ष रूप से गर्म हो जाता है । तत्पश्चात धीरे – धीरे इस ताप को अंतरिक्ष में संचरित कर दिया जाता है । पृथ्वी रात के समय ठंडी हो जाती है अगर आसमान साफ है ।

❇️  पृथ्वी के धरातल पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक :-

🔹 उष्मा किसी पदार्थ के कणों में अणुओं की गति को दर्शाती है , वही तापमान किसी पदार्थ या स्थान के गर्म या ठण्डा होने को दर्शाता है जिसे डिग्री में मापते हैं । किसी भी स्थान पर वायु का तापमान निम्नलिखित कारकों द्वारा प्रभावित होता है : 

🔶 अक्षांश ( Latitude ) :- किसी भी स्थान का तापमान उस स्थान द्वारा प्राप्त सूर्यातप पर निर्भर करता है । सूर्यातप की मात्रा में अक्षांश के अनुसार भिन्नता पाई जाती है । 

🔶 उत्तुंगता या ऊँचाई ( Altitude ) :- वायुमण्डल पार्थिव विकिरण के द्वारा नीचे से ऊपर की ओर गर्म होता है । यही कारण है कि समुद्र तल के पास के स्थानों पर तापमान अधिक तथा ऊँचे भाग में स्थित स्थानों पर तापमान कम होता है । 

🔶 समुद्र से दूरी ( Distance from sea ) :- किसी भी स्थान के तापमान को प्रभावित करने वाला दूसरा महत्वपूर्ण कारक समुद्र से उस स्थान की दूरी है । स्थल की अपेक्षा समुद्र धीरे – धीरे गर्म और धीरे – धीरे ठण्डा होता है । समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों पर समुद्र एंव स्थल समीर का सामान्य प्रभाव पड़ता है ।

🔶 वायुसंहति या वायु राशि तथा महासागरीय धाराएं ( Air Masses & Oceanic Currents ) :- वायु राशि भी तापमान को प्रभावित करती है । कोष्ण वायु सहतियों से प्रभावित होने वाले स्थानों का तापमान अधिक तथा ठंडी वायु संहतियों से प्रभावित स्थानों का तापमान कम होता है । इसी प्रकार महासागरीय धाराओं का प्रभाव भी तापमान पर पड़ता है ।

❇️ तापमान का व्युत्क्रमण ( Temperature Inversion ) :-

🔹 वायुमण्डल की सबसे निचली परत क्षोभमण्डल जो पृथ्वी के धरातल से सटी हुई है , में ऊचाई के साथ सामान्य परिस्थितियों में तापमान – घटता है । परन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में ऊचाई के साथ तापमान घटने के स्थान पर बढ़ता है । ऊंचाई के साथ तापमान के बढ़ने को व्युत्क्रमण कहते हैं । स्पष्ट है कि तापमान के प्रतिलोमन में धरातल के समीप ठंडी वायु तथा ऊपर की और गर्म वायु होती है ।

❇️ व्युत्क्रमण के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ :-

🔹 तापमान के व्युत्क्रमण के लिए निम्नलिखित भौगोलिक परिस्थितियाँ सहयोगी होती हैं :-

🔶 लम्बी रातें :- पृथ्वी दिन के समय ताप ग्रहण करती है तथा रात के समय ताप छोड़ती है । रात्रि के समय ताप छोड़ने से पृथ्वी ठण्डी हो जाती है । और पृथ्वी के आस – पास की वायु भी ठण्डी हो जाती है तथा उसके ऊपर की वायु अपेक्षाकृत गर्म होती है ।

🔶 स्वच्छ आकाश :- भौमिक विकिरण द्वारा पृथ्वी के ठण्डा होने के लिए स्वच्छ अथवा मेघरहित आकाश का होना अति आवश्यक है , मेघ , विकिरण में बाधा डालते हैं तथा पृथ्वी एवं उसके साथ लगने वाली वायु को ठण्डा होने से रोकते हैं । 

🔶 शान्त वायु :- वायु के चलने से निकटवर्ती क्षेत्रों के बीच ऊष्मा का आदान प्रदान होता है । जिससे नीचे की वायु ठण्डी नहीं हो पाती और तापमान का व्युत्क्रमण नहीं हो पाता । 

🔶 शुष्क वायु :- शुष्क वायु में ऊष्मा को ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है । जिससे तापमान की हास दर में कोई परिवर्तन नहीं होता । परन्तु शुष्क वायु भौमिक विकिरण को शोषित नहीं कर सकती । अतः ठण्डी होकर तापमान के व्युत्क्रमण की स्थिति पैदा करती है । 

🔶 हिमाच्छादन :- हिम , सौर विकिरण के अधिकांश भाग को परावर्तित कर देती है । जिससे वायु की निचली परत ठंडी रहती है और तापमान का व्युत्क्रमण होता है । क्षेत्रों में साल भर व्युत्क्रमण होता है ।

❇️ तापमान के सामान्य हास दर :-

🔹 ऊँचाई बढ़ने के साथ – साथ तापमान कम होता चला जाता है । 1000 मी . की ऊँचाई पर तापमान में 6.5 ° डिग्री सेल्सियस की कमी हो जाती हैं । इसे ही तापमान की सामान्य हास दर कहते हैं ।

❇️ पृथ्वी के ऊष्मा बजट का वर्णन विस्तार पूर्वक :-

🔹 वायुमंडल की ऊपरी सतह को 100 इकाई सूर्यातप प्राप्त होता है । इसका विवरण इस प्रकार है :-

🔶 सूर्यातप का विकिरण :- 

सौर विकिरण की परावर्तित मात्रा को एल्बिड़ा ( Albedo ) कहा जाता है । 

  • 1 . 16 % धूल कण और वाष्प कणों द्वारा अवशोषित होता है । 
  • 2. 3 % बादलों द्वारा अवशोषित होता है । 
  • 3. 6 % वायु द्वारा परावर्तित हो जाता है । 
  • 4. 20 % बादलों द्वारा परावर्तित हो जाता है । 
  • 5. 4 % जल और स्थल द्वारा परावर्तित हो जाता है । 
  • 6. 51 % सूर्यातप पृथ्वी पर जल और स्थल द्वारा अवशोषित होता है ।

 33 + 16 = 49 इकाईयाँ 

🔶 पार्थिव विकिरण :- 51 % इकाइयों में से 

  • 1. 17 % इकाईयाँ सीधे अंतरिक्ष में चली जाती हैं । 
  • 2. 6 % वायुमंडल द्वारा अवशोषित होती हैं । 
  • 3. 9 % संवहन के जरिए अवशोषित होता है । 
  • 4. 19 % संघनन की गुप्त उष्मा के रूप में । 

17 + 6 + 9 + 19 =51 इकाईयाँ 

❇️  जुलाई तथा जनवरी की समताप रेखाओं की विशेषताएं :-

🔶 जनवरी :-

🔹 जनवरी में समताप रेखाएं महासागरों में उत्तर तथा महाद्वीपों पर दक्षिण की ओर झुक जाती हैं । जनवरी का माध्य मासिक तापमान विषुवत रेखीय महासागरों पर 27 ° C से ज्यादा होता है , उष्ण कटिबंधों में 24 ° C से ज्यादा , मध्य अक्षांशों पर 20 ° C से 0 ° डिग्री सेल्सियस एंव यूरेशिया के आंतरिक भाग में -18 ° सेल्सियस से -48 ° सेल्सियस तक अंकित किया जाता है ।

🔹 दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान भिन्नता कम होती है क्योंकि वहाँ जल भाग ज्यादा है इसलिए समताप रेखाएँ लगभग अक्षांशों के समान्तर चलती है ।

🔶 जुलाई :-

🔹 इस मौसम में समताप रेखाएँ उष्ण कटिबंध में 30 ° सेल्सियस से अधिक के कोष्ठ का निर्माण महाद्वीपों के भीतर करती है । यहाँ 40 ° उत्तरी तथा दक्षिणी अंक्षाशों पर 10 ° सेल्सियस की समताप रेखाएँ देखी जाती हैं । दक्षिणी गोलार्द्ध की समताप रेखाएँ उत्तर की अपेक्षा ज्यादा सरल व सीधी देखी जाती हैं ।

🔹 जुलाई में समताप रेखाएं महाद्वीपों पर प्रवेश करते हुए उत्तर की ओर तथा महासागरों में प्रवेश करते हुए दक्षिण की ओर मुड़ जाती हैं ।

❇️  साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापांतर सर्वाधिक होता है । क्यों ? 

🔹 कोष्ण महासागरीय धारा गल्फ स्ट्रीम उत्तर की ओर मुड़ जाती है तथा उन क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती है । तथा उत्तरी अटलांटिका ड्रिफ्ट की मौजूदगी से उत्तरी अटलांटिका सागर ज्यादा गर्म होता है तथा सतह के ऊपर तापमान शीघ्रता से कम हो जाता है ।

❇️ दक्षिणी गोलार्ध में तापमान पर महासागरों :-

🔹 यहाँ समताप रेखाएं लगभग अक्षांशों के समांतर चलती है । 

🔹 इन रेखाओं में उत्तरी गोलार्ध की अपेक्षा भिन्नता कम तीव्र होती है ।

🔹 20 ° से . , 10 ° से . एवं 0 से . की समताप रेखाएं क्रमशः 35 ° द . , 45 ° द . तथा 60 ° दक्षिण के समांनातर पाई जाती है ।

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