Class 11 History Chapter 6 तीन वर्ग Notes In Hindi

11 Class History Chapter 6 तीन वर्ग Notes In Hindi Three Orders

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 11
SubjectHistory
Chapter Chapter 6
Chapter Nameतीन वर्ग
Three Orders
CategoryClass 11 History Notes in Hindi
MediumHindi

Class 11 History Chapter 6 तीन वर्ग Notes In Hindi जिसमे हम तीन वर्ग , पादरी वर्ग , अभिजात वर्ग , कृषक वर्ग , चौदहवीं शताब्दी का संकट आदि के बारे में पड़ेंगे ।

Class 11 History Chapter 6 तीन वर्ग Three Orders Notes In Hindi

📚 अध्याय = 6 📚
💠 तीन वर्ग 💠

❇️ तीन वर्ग :-

🔹 यूरोप में फ्रांसिसी समाज मुख्यत : तीन वर्गों में विभाजित था जो निम्नलिखित है :-

🔶 पादरी वर्ग :- 

  • ईसाई समाज का मार्गदर्शन ।
  • चर्च में धर्मोपदेश ।
  • भिक्षु : – निश्चित नियमों का पालन ।
  • धार्मिक समुदायों में रहना ।
  • आम आदमी से दूर मठों में निवास ।

🔶 अभिजात वर्ग :- 

  • सैन्य क्षमता ।
  • अपनी संपदा पर स्थायी नियंत्रण ।
  • न्यायालय लगाने का अधिकार ।
  • अपनी मुद्रा का प्रचलन 
  • नाइट :- अश्वसेना की आवश्यकता के कारण इस वर्ग का उदय ।

🔶 कृषक वर्ग :- 

🔹 ये दो प्रकार के है :-

🔸 स्वतंत्र किसान :- अपनी भूमि को लार्ड के काश्तकार के रूप में देखना ।

🔸 कृषि दास या सर्फ :- लार्ड के भूखण्डों पर कार्य करना ।

❇️ यूरोपीय इतिहास की जानकारी के स्त्रोत :-

🔹 भू – स्वामियों के विवरण , मूल्यों और विधि के मुकदमों के दस्तावेज जैसे कि चर्च में मिलने वाले जन्म , मृत्यु और विवाह के आलेख । चर्च से प्राप्त अभिलेखों ने व्यापारिक संस्थाओं और गीत व कहानियों द्वारा त्योहारों व सामुदायिक गतिविधियों का बोध कराया । 

❇️ सामंतवाद :-

🔹 सामन्तवाद शब्द जर्मन शब्द फ्यूड से बना है । फ्यूड का अर्थ है – भूमि का टुकड़ा । 

🔹 सामन्तवाद एक तरह के कृषि उत्पादन को दर्शाता है जो सामंतों और कृषकों के संबंधों पर आधारित है । कृषक लार्ड को श्रम सेवा प्रदान करते थे और बदले में वे उन्हें सैनिक सुरक्षा देते थे । 

🔹 सामन्तवाद पर सर्वप्रथम काम करने वाले फ्रांसीसी विद्वान मार्क ब्लॉक के द्वारा भूगोल के महत्व पर आधारित मानव इतिहास को गढ़ने पर जोर , जिससे कि लोगों के व्यवहार और रुख को समझा जा सके ।

📚 पहला वर्ग –  पादरी वर्ग  📚

❇️ पादरियों व बिशपों द्वारा ईसाई समाज का मार्गदर्शन :-

🔹 ये प्रथम वर्ग के सदस्य थे जो चर्च में धर्मोपदेश , अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति जो चर्च के बाहर धार्मिक समुदायों में रहते थे भिक्षु कहलाते थे । ये भिक्षु मठों पर रहते थे और निश्चित नियमों का पालन करते थे । 

🔹 इनके पास राजा द्वारा दी गई भूमियाँ थी , जिनसे वे कर उगाह सकते थे । अधिकतर गाँव में उनके अपने चर्च होते थे जहाँ वे प्रत्येक रविवार को लोग पादरी के धर्मोपदेश सुनने तथा सामूहिक प्रार्थना करने के लिए इक्कठा होते थे । 

❇️ पादरियों और बिशपों की विशेषताएँ :-

🔹 इनके पास राजा द्वारा दी गई भूमियाँ थी , जिनसे वे कर उगाह सकते थे । 

🔹 रविवार के दिन ये लोग गाँव में धर्मोपदेश देते थे और सामूहिक प्रार्थना करते थे । 

🔹 ये फ़्रांसिसी समाज के प्रथम वर्ग में शामिल थे इन्हें विशेषाधिकार प्राप्त था । 

🔹 टाईथ नमक धार्मिक कर भी वसूलते थे । 

🔹 जो पुरुष पादरी बनते थे वे शादी नहीं कर सकते थे | 

🔹 धर्म के क्षेत्र में विशप अभिजात माने जाते थे और इनके पास भी लार्ड की तरह विस्तृत जागीरें थी । 

❇️ भिक्षु और मठ :-

🔹 चर्च के आलावा कुछ विशेष श्रद्धालु ईसाइयों की एक दूसरी तरह की संस्था थी । जो मठों पर रहते थे और एकांत जीवन व्यतीत करते थे । ये मठ मनुष्य की आम आबादी से बहुत दूर हुआ करती थी । 

❇️ दो सबसे अधिक प्रसिद्ध मठों के नाम :-

  • 529 में इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट मठ । 
  • 910 में बरगंडी में स्थापित क्लूनी मठ । 

❇️ भिक्षुओं की विशेषताएँ :-

🔹 ये मठों में रहते थे । 

🔹 इन्हें निश्चित और विशेष नियमों का पालन करना होता था । 

🔹 ये आम आबादी से बहुत दूर रहते थे । 

🔹 भिक्षु अपना सारा जीवन ऑबे में रहने और समय प्रार्थना करने , अध्ययन और कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का व्रत लेता था । 

🔹 पादरी – कार्य के विपरीत भिक्षु की जिंदगी पुरुष और स्त्रिायाँ दोनों ही अपना सकते थे – ऐसे पुरुषों को मोंक ( Monk ) तथा स्त्रियाँ नन ( Nun ) कहलाती थी । 

🔹 पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग – अलग ऑबे थे । पादरियों की तरह , भिक्षु और भिक्षुणियाँ भी विवाह नहीं कर सकती थे । 

🔹 वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम – घूम कर लोगों को उपदेश देते और दान से अपनी जीविका चलाते थे । 

❇️ फ्रांसिसी समाज में मठों का योगदान :-

🔹 मठों कि संख्या सैकड़ों में बढ़ने से ये एक समुदाय बन गए जिसमें बड़ी इमारतें और भू – जागीरों के साथ – साथ स्कूल या कॉलेज और अस्पताल बनाए गए । 

🔹 इन समुदायों ने कला के विकास में योगदान दिया | 

🔹 आबेस हिल्डेगार्ड एक प्रतिभाशाली संगीतज्ञ था जिसने चर्च की प्रार्थनाओं में सामुदायिक गायन की प्रथा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया । 

🔹 तेरहवीं सदी से भिक्षुओं के कुछ समूह जिन्हें फ्रायर ( frlars ) कहते थे उन्होंने मठों में न रहने का निर्णय लिया ।

📚 दूसरा वर्ग – अभिजात वर्ग  📚

❇️ अभिजात वर्ग :-

🔹 यूरोप के सामाजिक प्रक्रिया में अभिजात वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी । ऐसे महत्वपूर्ण संसाधन भूमि पर उनके नियंत्रण के कारण था । यह वैसलेज ( Vassalage ) नामक एक प्रथा के विकास के कारण हुआ था ।

🔹 बड़े भू स्वामी और अभिजात वर्ग राजा के आधीन होते थे जबकि कृषक भू – स्वामियों के अधीन होते थे । अभिजात वर्ग राजा को अपना स्वामी मान लेता था और वे आपस में वचनबद्ध होते थे ।

❇️  सेन्योर / लॉर्ड :-

🔹 सेन्योर / लॉर्ड ( लॉर्ड एक ऐसे शब्द से निकला जिसका अर्थ था रोटी देने वाला ) दास ( Vassal ) की रक्षा करता था और बदले में वह उसके प्रति निष्ठावान रहता था । इन संबंधों में व्यापक रीति रिवाजों और शपथ लेकर की जाती थी ।

❇️ अभिजात वर्ग की विशेषताएँ :-

🔹 अभिजात वर्ग की एक विशेष हैसियत थी । उनका अपनी संपदा पर स्थायी तौर पर पूर्ण नियंत्राण था । 

🔹 वह अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकते थे उनके पास अपनी सामंती सेना थी । 

🔹 वे अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे । 

🔹 यहाँ तक कि अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकते थे । 

🔹 वे अपनी भूमि पर बसे सभी व्यक्तियों के मालिक थे ।

📚 तीसरा वर्ग – कृषक वर्ग  📚

❇️ कृषक वर्ग :-

🔹  स्वतंत्र और बंधकों ( दासों ) का वर्ग था । यह वर्ग एक विशाल समूह था जो पहले दो वर्गों पादरी और अभिजात वर्ग का भरण पोषण करता था । 

❇️ काश्तकार दो प्रकार के होते थे :-

  • ( i ) स्वतंत्र किसान 
  • ( ii ) सर्फ़ ( कृषि दास ) 

❇️ स्वतंत्र कृषकों की भूमिका :-

🔹 स्वतंत्र कृषक अपनी भूमि को लॉर्ड के काश्तकार के रुप में देखते थे । 

🔹 पुरुषों का सैनिक सेवा में योगदान आवश्यक होता था ( वर्ष में कम से कम चालीस दिन ) । 

🔹 कृषकों के परिवारों को लॉर्ड की जागीरों पर जाकर काम करने के लिए सप्ताह के तीन या उससे अधिक कुछ दिन निश्चित करने पड़ते थे । इस श्रम से होने वाला उत्पादन जिसे ‘ श्रम – अधिशेष ( Labour rent ) कहते थे , सीधे लार्ड के पास जाता था । 

🔹 इसके अतिरिक्त , उनसे अन्य श्रम कार्य जैसे – गढ्ढे खोदना , जलाने के लिए लकड़ियाँ इक्कठी करना , बाड़ बनाना और सड़कें व इमारतों की मरम्मत करने की भी उम्मीद की जाती थी और इनके लिए उन्हें कोई मज़दूरी नहीं मिलती थी । 

🔹 खेतों में मदद करने के अतिरिक्त , स्त्रियों व बच्चों को अन्य कार्य भी करने पड़ते थे । वे सूत कातते , कपड़ा बुनते , मोमबत्ती बनाते और लॉर्ड के उपयोग हेतु अंगूरों से रस निकाल कर मदिरा तैयार करते थे ।

❇️ टैली ( Taile ) :-

🔹 राजा द्वारा कृषकों पर लगाये जाने वाले प्रत्यक्ष कर को टैली ( Taille ) कहा जाता था ।

❇️ श्रम अधिशेष :-

🔹 कृषकों के परिवारों को लॉर्ड की जागीरों पर जाकर काम करने के लिए सप्ताह के तीन या उससे अधिक कुछ दिन निश्चित करने पड़ते थे । इस श्रम से होने वाला उत्पादन जिसे ‘ श्रम – अधिशेष ‘ ( Labour rent ) कहते थे , सीधे लार्ड के पास जाता था ।

❇️ कृषि दास :-

🔹 वे कृषक जो लार्ड के स्वामित्व में ही कार्य कर सकते थे कृषि दास कहलाते थे ।

❇️ ग्यारहवीं शताब्दी तक यूरोप में विभिन्न प्रौद्योगिकी में बदलाव :-

🔹 लकड़ी के हल के स्थान पर लोहे के भारी नोक वाले हल और साँचेदार पटरे का प्रयोग । 

🔹 पशुओं के गले के स्थान पर जुआ अब कंधे पर । 

🔹 घोड़े के खुरों पर अब लोहे की नाल का प्रयोग ।

🔹  कृषि के लिये वायु और जलशक्ति का प्रयोग ।

🔹  संपीडको व चक्कियों में भी वायु तथा जलशक्ति का प्रयोग ।

🔹  दो खेतों की व्यवस्था के स्थान पर तीन खेतों वाली व्यवस्था का उपयोग । कृषि उत्पादन में तेजी से बढ़ोतरी । 

🔹 भोजन की उपलब्धता दुगुनी । 

🔹 कृषकों को बेहतर अवसर । 

🔹 जोतों का आकार छोटा । 

🔹 इससे अधिक कुशलता के साथ कृषि कार्य होना व कम श्रम की आवश्यकता । 

🔹 कृषकों को अन्य गतिविधियों के लिए समय ।

❇️ चौदहवीं शताब्दी का संकट :-

🔹 चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप को आर्थिक विस्तार धीमा पड़ने के कारण :-

  • तेरहवीं सदी के अंत तक उत्तरी यूरोप में तेज ग्रीष्म ऋतु का स्थान ठंडी ग्रीष्म ऋतु ने ले लिया । 
  • पैदावार के मौसम छोटे , तूफानों व सागरीय बाढ़ों से फार्म प्रतिष्ठान नष्ट । सरकार को करों से आमदनी में कमी ।
  • पहले की गहन जुताई के तीन क्षेत्रीय फसल चक्र से भूमि कमजोर । 
  • चरागाहों की कमी से पशुओं की संख्या में कमी । 
  • जनसंख्या वृद्धि के कारण उपलब्ध संसाधन कम पड़ना । 
  • 1315 – 1317 में यूरोप में भयंकर अकाल , 1320 ई . में अनेक पशुओं की मौत । आस्ट्रिया व सर्बिया की चाँदी की खानों के उत्पादन में कमी ।
  • धातु – मुद्रा में कमी से व्यापार प्रभावित । 
  • जल पोतों के साथ चूहे आए जो ब्यूबोनिक प्लेग जैसी महामारी का संक्रमण लाए । लाखों लोग ग्रसित । 
  • विनाशलीला के साथ आर्थिक मंदी से सामाजिक विस्थापन हुआ । मजदूरों की संख्या में कमी आई इससे मजदूरी की दर में 250 प्रतिशत तक की वृद्धि ।

❇️ राजनीतिक परिवर्तन :-

🔹 नए शक्तिशाली राज्यों का उदय – संगठित स्थायी सेना , एक स्थायी नौकरशाही और राष्ट्रीय कर प्रणाली स्थापित करने की प्रक्रिया आरंभ । 

❇️ नई शासन व्यवस्था पूरानी व्यवस्था से भिन्न :-

🔹 शासक अब पिरामिड के शिखर पर नहीं था जहाँ राज भक्ति विश्वास और आपसी निर्भरता पर टिकी थी । वह अब व्यापक दरबारी समाज और आश्रयदाता – अनुयायी तंत्र का केन्द्र बिन्दु था ।

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