Class 11 Economics – II Chapter 9 पर्यावरण और धारणीय विकास Notes In Hindi

11 Class Economics – II Chapter 9 पर्यावरण और धारणीय विकास Notes In Hindi Environment Sustainable Development

BoardCBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board
TextbookNCERT
ClassClass 11
SubjectEconomics 2ND BOOK
Chapter Chapter 9
Chapter Nameपर्यावरण और धारणीय विकास
Environment Sustainable Development
CategoryClass 11 Economics Notes in Hindi
MediumHindi

Class 11 Economics – II Chapter 9 पर्यावरण और धारणीय विकास Notes In Hindi जिसमे हम धारणीय विकास , पर्यावरण , वैश्विक उष्णता , भारत में पर्यावरण आदि के बारे में पड़ेंगे ।

Class 11 Economics – II Chapter 9 पर्यावरण और धारणीय विकास Environment Sustainable Development Notes In Hindi

📚 अध्याय = 9 📚
💠 पर्यावरण और धारणीय विकास 💠

❇️ धारणीय विकास :-

🔹 धारणीय विकास की कई परिभाषाएँ दी गई हैं परंतु सर्वाधिक उद्धृत परिभाषा आवर कॉमन फ्यूचर ( Our common future ) जिसे बुटलैंड रिपोर्ट के नाम से भी जाना जाता है , ने दी है । ऐसी विकास जो वर्तमान पीढी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता का समझौता किए बिना परा करे ।

❇️ धारणीय विकास का अर्थ :-

🔹 धारणीय विकास की अवधारणा मुख्यतः तीन आधारों पर निर्भर करती है जो कि आर्थिक पर्यावरणीय तथा सामाजिक या पारिस्थितिकी , अर्थव्यवस्था और समानता है । कुछ लेखकों ने चौथे आधार के रूप में संस्कृति को भी स्वीकार किया है ।

❇️ धारणीय विकास की प्राप्ति के उपाय :-

🔶 ऊर्जा के गैर – पारंपरिक स्रोतों का उपयोग :- भारत अपनी विद्युत आवश्यकताओं के लिए थर्मल और हाइड्रो पॉवर संयंत्रों पर बहुत अधिक निर्भर है । इन दोनों का पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । वाय शक्ति और सौर ऊर्जा गैर – पारंपरिक स्रोतों के अच्छे उदाहरण हैं । तकनीक के अभाव में इनका विस्तृत रूप से अभी तक विकास नहीं हो पाया है ।

🔶 अधिक स्वच्छ ईंधनों का उपयोग :- शहरी क्षेत्रों में ईंधन के रूप में उच्च दाब प्राकृतिक गैस ( CNG ) के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है । दिल्ली में जन – परिवहन में उच्च दाब प्राकृतिक गैस के उपयोग से प्रदूषण कम हुआ है और वायु स्वच्छ हुई है । ग्रामीण क्षेत्र में बायोगैस और गोबर गैस को प्रोत्साहित किया जा रहा है जिससे वायु प्रदुषण कम हुआ है ।

🔶 लघु जलीय प्लांटों की स्थापना :- पहाड़ी इलाकों में लगभग सभी जगह झरने मिलते हैं । इन झरनों पर लघु जलीय प्लांटों की स्थापना हो सकती है । ये पर्यावरण के अनुकूल होते हैं । 

🔶 पारंपरिक ज्ञान व व्यवहार :- पारंपरिक रूप से भारत की कषि व्यवस्था , स्वास्थ्य सुविधा व्यवस्था , आवास , परिवहन सभी क्रियाकलाप पर्यावरण के लिए हितकर रहे हैं । परंतु आजकल हम अपनी पारंपरिक प्रणालियों से दूर हो गए हैं , जिससे हमारे पर्यावरण और हमारी ग्रामीण विरासत को भारी मात्रा में हानि पहँची है । 

🔶 अधारणीय उपभोग तथा उत्पादन प्रवृत्तियों में परिवर्तन :- धारणीय विकास प्राप्त करने के लिए हमें उपभोग प्रवृत्ति ( संसाधनों के अति उपयोग और दुरुपयोग की अवहेलना ) तथा उत्पादन प्रवृति ( पर्यावरण अनुकूल तकनीकों का प्रयोग ) में परिवर्तन करने की आवश्यकता है ।

❇️ धारणीय विकास की रणनितियाँ :-

🔶 ग्रामीण क्षेत्र के निवासी होने पर :- 

  • ग्रामीण क्षेत्रों में जलाऊ लकड़ी , उपलों या अन्य जैव पदार्थ के स्थान पर रसोई गैस और गोबर गैस का उपयोग ।
  • जहाँ पर खुला स्थान है उन गाँवों में वायु मिलों की स्थापना की जा सकती है । 
  • हमें कृषि , स्वास्थ्य , आवास और परिवहन में ऐसा पारंपरिक ज्ञान और व्यवहार का प्रयोग करना चाहिए जो पर्यावरण के अनुकूल हो । 
  • रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर जैविक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाना चाहिए । 
  • रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर हमें जैविक कंपोस्ट खाद का प्रयोग करना चाहिए ।

🔶 शहरी क्षेत्र के निवासी होने पर :-

  • फोटोवोल्टिक सेल दवारा सौर ऊर्जा का प्रयोग किया जाना चाहिए । 
  • वाहनों में पेट्रोल या डीजल की जगह उच्च दाब प्राकृतिक गैस ( CNG ) का प्रयोग किया जाना चाहिए । 
  • हमें अपनी आवश्यकताओं को कम करना चाहिए ।

❇️ संसाधनों पर आर्थिक विकास का प्रभाव :-

  • आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधनों के निस्तर पतन का कारण है । 
  • प्राकृतिक संसाधनों का अतिशय दोहन । 
  • निस्तर तीव्र आर्थिक विकास संसाधनों की कमी उत्पन्न कर रहा है तथा उनकी गैर धारणीय बना रहा है । 
  • उन्नत तकनीक द्वारा संसाधनों की उपलब्धता में वृद्धि । 
  • संसाधनों का प्रतिस्थापन उत्पन्न करते हैं ।

❇️ पर्यावरण :-

🔹 पर्यावरण को कुल ग्रहों की विरासत और सभी संसाधनों की समग्रता के रूप में परिभाषित किया गया है ।  इसमें सभी बायोटिक और अजैविक तत्व शामिल हैं जो एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।  सभी जीवित तत्व-पक्षी, पशु और पौधे, वन, मत्स्य आदि जीव तत्व हैं ।  

🔹 पर्यावरण के अजैव तत्वों में निर्जीव तत्व जैसे हवा, पानी, भूमि, चट्टानें और सूर्य के प्रकाश आदि शामिल हैं ।

❇️ पर्यावरण के कार्य :-

  • यह जीवन के लिए संसाधन प्रदान करता है । 
  • नवीकरणीय तथा गैर – नवीकरणीय दोनों पर्यावरण दवारा ही प्रदान किये जाते हैं । 
  • यह अवशेष को समाहित करता है । 
  • यह जनहित और जैविक विविधता प्रदान करके जीवन का पोषण करता है । 
  • यह सौंदर्य विलयक सेवाएँ भी प्रदान करता है ।

❇️  पर्यावरण का आर्थिक विकास प्रभाव :-

  • आर्थिक विकास और तीव्र वृद्धि ध्वनि प्रदूषण तथा वायु की गुणवत्ता में कमी आती है । 
  • यह पर्यावरण संकट उत्पन्न कर सकती है तथा धारणीय विकास में कमी आयेगी । 
  • वनों का निम्नीकरण के वर्षा में कमी ।
  • मत्यस्य संसाधनों का अधिक दोहन ।
  • सभी सड़कें , होटल , माल इत्यादि निर्माण से जैव विविधता की हानि ।

❇️ वैश्विक उष्णता :-

🔹 ग्रीन हाउस गैस , जानवरों के अपशिष्ट से निकलने वाली गैस , वनों का विनाश कारण पृथ्वी के औसत तापमान में हाने वाली वृद्धि ही वैश्विक उष्णता है । वैश्विक उष्णता के प्राथमिक स्रोत कार्बनडाइ ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसें , तीव्र उत्सर्जन , जीवाश्म ईंधन का उपयोग और मीथेन का उत्पादन , कृषि तथा अन्य मानवीय गतिविधियाँ हैं । 

🔹 वैश्विक तापमान में वृद्धि के परिणाम स्वरूप पृथ्वी के ध्रुवों पर बर्फ पिघल रही है समुद्रस्तर में वृद्धि के कारण तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का प्रभाव , भीषण आंधी और कटिबन्धीय तूफान के प्रभाव में वृद्धि के साथ अन्य मौसमी घटनाएं बढ़ी है ।

❇️ भारत में पर्यावरण संबंधी महत्त्वपूर्ण मुद्दे :-

🔶 जल संक्रमण :- भारत में औद्योगिक अवशिष्ट के कारण पेय जल संक्रामक होता जा रहा है । इससे जल संक्रामक बीमारियाँ फैल रही हैं । 

🔶 वायु – प्रदूषण :- शहरीकरण के कारण , भारतीय सड़कों पर वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है । मोटर वाहनों की संख्या 1951 के 3 लाख से बढ़कर 2003 में 67 करोड़ हो गई । भारत विश्व में दसवॉ सर्वाधिक औद्योगिक देश है परंतु यह पर्यावरण पर अनचाहे एवं अप्रत्याशित प्रभावों की अवसर लागत पर हुआ है ।

🔶 वनों की कटाई :- भारत का वन आवरण बढ़ती जनसंख्या के कारण लगातार कम हो रहा है । इससे वायु प्रदूषण तथा उससे जुड़ी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं । भारत में प्रतिव्यक्ति वन भूमि 0 . 08 हेक्टेयर है जबकि आवश्यकता 0 . 47 हेक्टेयर की है । 

🔶 भू – क्षय :- भू – क्षय वन विनाश के फलस्वरूप वनस्पति की हानि , वन भूमि का अतिक्रमण , वनों में आग और अत्यधिक चराई , भू – संरक्षण हेतु समुचित उपायों को न अपनाया जाना , अनुचित फसल चक्र , कृषि – रसायन का अनुचित प्रयोग , सिंचाई व्यवस्था का नियोजन तथा अविवेकपूर्ण प्रबंधन , संसाधनों की निर्बाध उपलब्धता तथा कृषि पर निर्भर लागतों की दरिद्रता के कारण हो रहा है ।

❇️ पर्यावरण संकट के योगदान में सरकार के समक्ष आई समस्याएँ :-

🔶 बढ़ती जनसंख्या :- बढ़ती जनसंख्या से प्राकृतिक संसाधनों की माँग बढ़ जाती है । जबकि प्राकृतिक संसाधनों की पूर्ति स्थिर है । इससे अतिरेक माँग उत्पन्न होती है जो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव डालती है । इन संसाधनों का अत्यधिक उपभोग किया जाता है और उपभोग धारण क्षमता की सीमा से बाहर चला जाता है जिससे पर्यावरणीय हानि होती है । इससे सरकार के समक्ष सर्व की आवश्यकताएँ पूरी करने में असमर्थता की समस्या आती है । 

🔶 वायु – प्रदूषण :- इससे कई प्रकार की बीमारियाँ जैसे दमा , फेफड़ों का कैंसर , क्षय रोग होती हैं । इससे सरकार के लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक व्यय की समस्या उत्पन्न होती है । 

🔶 जल – प्रदूषण :- इससे हैजा , मलेरिया , अतिसार , दस्त जैसी कई बीमारियाँ होती हैं । इससे भी सरकार के लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक व्यय की समस्या उत्पन्न होती है । 

🔶 संपन्न उपभोग मानक :- इससे प्राकृतिक संसाधनों की माँगें बढ़ जाती हैं । जबकि प्राकृतिक संसाधनों की पूर्ति स्थिर है । इससे अतिरेक माँग उत्पन्न होती है । जो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव डालती है । इन संसाधनों का अत्यधिक उपभोग किया जाता है और उपभोग धारण क्षमता की सीमा से बाहर चला जाता है । जिससे पर्यावरणीय हानि होती है । इससे समस्या ये उत्पन्न होती है कि अमीर वर्ग तो कुत्तों के खाने , सौंदर्य प्रसाधन और विलासिताओं पर व्यय करते हैं और गरीब वर्ग को अपने बच्चों और परिवार की आधारभूत आवश्यकताओं के लिए भी धन नहीं मिलता । 

🔶 निरक्षरता :- ज्ञान के अभाव के कारण लोग ऐसे संसाधनों का प्रयोग करते रहते हैं जैसे – उपले , लकड़ी आदि । इससे संसाधनों का दुरुपयोग होता है । यह दुरुपयोग पर्यावरण को हानि पहुंचाता है । सरकार को लोगों के स्वास्थ्य पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है । जागरूकता के अभाव में स्वच्छता पर ध्यान नही देते । कूड़ा – कचरा का उचित प्रबंध निरक्षर लोग ठीक से नहीं करते । 

🔶 औद्योगीकरण :- इससे वायु – प्रदूषण , जल – प्रदूषण में और ध्वनि प्रदूषण होता है । इससे काफी बीमारियों फैलती है । जहरीली गैसें हवाओं में तथा जहरीले रसायन नदियो , तालाब व भूजल में मिल जाले हैं । इससे पशु – पक्षी , पेड़ – पौध जीव जंतु सभी बुरी तरह से प्रभावित होते हैं । 

🔶 शहरीकरण :- इनसे संसाधनों का अति उपयोग होता है और यह उपयोग धारण क्षमता की सीमा को पार कर देता है जिससे पर्यावरण का अपक्षय होता है । इससे भी आय की असमानताओं के कारण अमीर वर्ग कुत्तों के खाने , सौंदर्य प्रसाधन पर खर्च करता है और गरीब वर्ग परिवार की आधारभूत आवश्यकताओं के लिए भी धन नहीं जुटा पाता ।

🔶 वन – क्षेत्र में कमी :- इससे पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है । कार्बन डाइऑक्साइड में वृद्धि से वैश्विक उष्णता हो रही है । अतः सरकार को स्वास्थ्य के साथ – साथ ऐसे तकनीकी अनुसंधान पर भी व्यय करना पड़ रहा है जिससे एक पर्यावरण अनुकूल वैकल्पिक तकनीक की खोज की जा सके । 

🔶 अवैध वन कटाई :- इससे जैविक विविधता प्रभावित हो रही है , मृदा क्षरण , वायु प्रदूषण में वृद्धि हो रही है जिससे खाद्य श्रृंखला पर भी प्रभाव पड़ रहा है । 

🔶 वैश्विक ऊष्णता :- वैश्विक उष्णता के कारण पूरे विश्व में तापमान बढ़ रहा है । यदि समुद्र के जल का तापमान मात्र 2°C से भी बढ़ गया तो संपूर्ण पृथ्वी जलमयी हो जाएगी ।

❇️ वर्तमान पर्यावरण संकट :-

🔹 भारत के पर्यावरण को दो तरफ से खतरा है । एक तो निर्धनता के कारण पर्यावरण का अपक्षय और दूसरा खतरा साधन संपन्नता और तेजी से बढ़ते हुए औद्योगिक क्षेत्रक के प्रदूषण से है । भारत की अत्यधिक गंभीर पर्यावरण समस्याओं में वायु प्रदूषण , दुषित जल , मृदा क्षरण , वन्य कटाव और वन्य जीवन की विलुप्ति है । 

🔶 जल – प्रदूषण :- भारत में ताजे जल के सर्वाधिक स्रोत अत्यधिक प्रदूषित होते जा रहे हैं । इनकी सफाई में सरकार को भारी व्यय करना पड़ रहा है । 120 करोड़ की जनसंख्या के लिए स्वच्छ जल का प्रबंधन सरकार के लिए एक बड़ी समस्या है । जल जीवों की विविधता भी विलुप्त होती दिखाई दे रही है ।

🔶 भूमि अपक्षय :- भारत में भूमि का अपक्षय विभिन्न मात्रा और रूपों में हुआ है , जो कि मुख्य रूप से अस्थिर प्रयोग और अनुपयुक्त ( प्रबंधन ) कार्य प्रणाली का परिणाम है । 

🔶 ठोस अवशिष्ठ प्रबंधन :- विश्व की 17 % जनसंख्या और विश्व पशुधन की 20 % जनसंख्या भारत की मात्र 2 . 5 % क्षेत्रफल में रहती है । जनसंख्या और पशुधन का अधिक घनत्व और वानिकी , कृषि , चराई , मानव बस्तियाँ और उद्योगों के प्रतिस्पर्धी उपयोगों से देश के निश्चित भूमि संसाधनों पर भारी दबाव पड़ता है ।

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