Class 12 Physical Education Chapter 7 शरीर क्रिया विज्ञान एवं खेलों में चोटें Notes In Hindi

12 Class Physical Education Chapter 7 शरीर क्रिया विज्ञान एवं खेलों में चोटें Notes In Hindi Injuries in physiology and sports

TextbookNCERT
ClassClass 12
SubjectPhysical Education
Chapter Chapter 7
Chapter Nameशरीर क्रिया विज्ञान एवं खेलों में चोटें
Injuries in physiology and sports
CategoryClass 12 Physical Education Notes in Hindi
MediumHindi

Class 12 Physical Education Chapter 7 शरीर क्रिया विज्ञान एवं खेलों में चोटें Notes In Hindi जिसमे हम शारीरिक पुष्टि के घटकों को निर्धारित करने वाले शरीर – क्रियात्मक कारक कार्डियो श्वसन संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव माँसपेशीय संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव बुढ़ापे के कारण शरीर क्रियात्मक परिवर्तन खेल चोटें – वर्गीकरण कारण बचाव प्राथमिक चिकित्सा – लक्ष्य व उद्देश्य आदि के बारे में पड़ेंगे ।

Class 12 Physical Education Chapter 7 शरीर क्रिया विज्ञान एवं खेलों में चोटें Injuries in physiology and sports Notes In Hindi

📚 अध्याय = 7 📚
💠 शरीर क्रिया विज्ञान एवं खेलों में चोटें 💠

❇️ शारीरिक पुष्टि के घटक :-

🔶 शक्ति :- 

  • माँसपेशियों का आकार 
  • माँसपेशियों की रचना 
  • शरीर का भार 
  • तंत्रिका आवेग की तीव्रता 
  • गतिविधि में भाग लेने वाली मांसपेशियों का समन्वय 
  • माँसपेशी की अतिवृिद्धि/अतिपुष्टि

🔶 गति :-

  • विस्फोट शक्ति 
  • माँसपेशीय संयोजन 
  • माँसपेशीय की लोच और आराम की योग्यता 
  • स्नायु संस्थान की गतिशीलता 
  • जैव रासायनिक भंडार तथा उपापचय योग्यता 
  • लचक

🔶 सहन क्षमता :- 

  • ऐरोबिक क्षमता 
  • एनारोबिक क्षमता 
  • क्रियाओं का अपव्यय 
  • मांसपेशीय संरचना

🔶  लचक :-

  • जोड़ों की शारीरिक संरचना 
  • आयु – लिंग 
  • माँसपेशीय शक्ति
  • माँसपेशीय का लचीलापन 
  • व्यक्ति की स्थिति 
  • चोटें 
  • माँसपेशीय खिंचाव 
  • वातावरण 
  • सक्रिय और गतिहीन जीवनशैली

❇️ शक्ति को निर्धारित करने वाले शरीर क्रियात्मक कारक :-

🔹 किसी व्यक्ति की शक्ति की प्रभावित करने कारक इस प्रकार है :-

🔶 मांसपेशियों का आकार :- बड़ी तथा विशाल मासपेशियाँ अधिक शक्ति उत्पन्न करती है पुरूषों की मांसपेशियाँ बड़ी होती है । इसलिए वे शक्तिशाली होती है । भार प्रशिक्षण की सहायता से मांसपेशी के आकार को बढ़ाया जा सकता है ।

🔶 शरीर का भार :- अधिक भार वाले व्यक्ति हल्के व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होते है । जैसे अधिक शरीर भार वाले भारोत्तलक । 

🔶 मांसपेशी संरचना :- जिन मांसपेशीयों में फॉस्ट टिवच फाइबर की प्रतिशतता अधिक होती है । वे अधिक शक्ति उत्पन्न करते है । जबकि स्लो ट्विच फाइवर्स शीघ्रता से संकुचित नहीं हो सकते , किंतु वे लंबी अवधियों तक संकुचित रहने की क्षमता रखते है । इन फाइबर्स की प्रतिशतता का निर्धारण आनुवंशिक तौर पर किया जाता है ।

🔶 तंत्रिका आवेग की प्रबलता :- जब किसी केन्द्रीय स्नायु संस्थान ( CNS ) से आने वाली अधिक तीव्र तंत्रिका आवेग अधिक संख्या में गत्यात्मक ईकाइयों की उद्दीप्त करता है । तो मांसपेशी अधिक बल से संकुचित होती है । और अधिक बल उत्पन्न करती है ।

❇️ सहन क्षमता को प्रभावित करने वाले शरीर क्रियात्मक कारक :-

🔶 एरोबिक क्षमता :-

  • ऑक्सीजन लेना तथा ग्रहण करना ।
  • ऑक्सीजन परिवहन
  • ऑक्सीजन अंत : ग्रहण 
  • ऊर्जा भड़ार 

🔶 एनारोबिक क्षमता :-

  • ATP और CP का शरीर में भड़ारण ।
  • बफ्फर क्षमता माँसपेशियों में अम्ल संचय को प्रभावहीन बनाना । 
  • लैक्टिक अम्ल की सहनशीलता ।
  • Vo2 Max यह ऑक्सीजन की वह मात्रा होती है जो सक्रिय मांसपेशियाँ व्यायाम के दौरान एक मिनट में प्रयोग में लाती है ।

❇️ लचक को निर्धारित करने वाले शरीर क्रियात्मक कारक :-

🔶 मांसपेशीय शक्ति :- मांसपेशियों में शक्ति का एक न्यूनतम स्तर होना आवश्यक है । विशेषकर गुरूत्व तथा बाहरी बल के विरूद्ध ।

🔶 में जोड़ों की बनावट :- मानव शरीर में कई प्रकार के जोड़ होते है । कुछ जोड़ो में मूलभूत रूप से अन्य जोड़ों की अपेक्षा अधिक प्रकार की गतियाँ करने की क्षमता होती है । उदाहरण- कंधे के ‘ बाल एवं सॉकेट जोड़ की घुटने के जोड़ की अपेक्षा गति की सीमा कहीं अधिक होती है ।

🔶 आंतरिक वातावरण :- किसी खिलाड़ी का आंतरिक वातावरण भी खिलाड़ी की लचक को निर्धारित करता है । उदाहरण- 10 मिनट तक गर्म पानी में रहने से शरीर के तापमान तथा लचक में वृद्धि होती है । तथा 10 ° C तापमान में बाहर रहने से कमी होती है ।

🔶 चोट :- संयोजक ऊतको तथा मांसपेशियों में चोट के कारण प्रभावित क्षेत्र में सूजन हो सकती है , रेशेदार ऊतक कम लचीले होते है , तथा अंगों के संकुचन को कम कर सकते है । जिससे लचीलेपन में कमी का कारण बन है ।

🔶 आयु तथा लिंग :- आयु में वृद्धि के साथ – साथ लचक में भी कमी आती है । यह प्रशिक्षणीय है । इसमें प्रशिक्षण द्वारा वृद्धि की जा सकती है । चूँकि इससे शक्ति तथा सहन शक्ति में वृद्धि होती है । लिंग भी लचक को निर्धारित करता है । पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक लचक पाई जाती हैं ।

🔶 सक्रिय और गतिहीन जीवन शैली :- नियमित व्यायाम लचक को बढ़ाती है । जबकि निष्क्रिय व्यक्ति लचक को कोमल ऊतको और जोड़ों के न सिकुड़ने तथा फैलने के कारण खो देता है ।

🔶 वशांकुक्रम :- लिगामेंट और कैप्सूल की संरचनाओं के कारण अस्थि संरचना के जोड़ और लम्बाई वशांनुगत है जिसमें खिंचाव वाले व्यायामों के द्वारा लचक उत्पन्न नहीं की जा सकती ।

❇️ गति को निर्धारित करने वाले शरीर क्रियात्मक कारक :-

🔶 विस्फोत्क शक्ति :- प्रत्येक तीव्र तथा विस्फोट गतिविधि हेतु विस्फोटक शक्ति होना जरूरी है , जैसे किसी मुक्केबाज में विस्फोटक शक्ति की कमी होगी तो वह मुक्केबाजी में तेज पंच नहीं मार सकता , इसके अतिरिक्त विस्फोटक शक्ति मांसपेशिय संरचना , आकार तथा सामंजस्य पर भी निर्भर करती है । 

🔶 मांसपेशीय गठन :- जिन मांसपेशी में फास्ट ट्विच रेशे अधिक होते हैं । वह अधिक गति कर सकते है । मांसपेशी का गठन आनुवांशिक रूप से निर्धारित होता है । प्रशिक्षण के द्वारा हम केवल कुछ सुधार कर सकते है । 

🔶 मांसपेशीयों की लोच और आराम की योग्यता :- मांसपेशीयों में लोच की योग्यता से मांसपेशियाँ अधि कतम सीमा तक गति कर सकती है । जिससे विरोध / प्रतिरोध को कम करके गतिविधियों को तीव्र कर सकते हैं , जो मांसपेशियां जल्दी ( Relax ) होती है , वे ही जल्दी संकुचित ( Contract ) होती है ।

🔶 स्नायु संस्थान की गतिशीलता :- स्नायु संस्थान की मोटर इन्द्रिय स्नायु ( Motor and Sensory nerves ) शरीर के अंगों की गतिशीलता को निर्धारित करती है । प्रशिक्षण द्वारा हम एक सीमा तक स्नायु संस्थान की गतिशीलता को बढ़ा सकते हैं । क्योंकि गति का निर्धारण काफी सीमा तक आनुवाशिंक कारकों पर निर्भर करता है ।

🔶 जैव – रासायनिक भंडार तथा उपापचय योग्यता :- तीव्र गति व्यायामों में मांसपेशियों को अधिक मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है । और यह ऊर्जा हमें माँसपेशियों में फॉस्फोरस ( ATP ) तथा क्रिएटिन फॉस्फेट ( CP ) की पर्याप्त मात्रा से मिलती है । प्रशिक्षण द्वारा ATP तथा CP की मात्रा तथा ऊर्जा आपूर्ति की दर में आवश्यकतानुसार वृद्धि की जा सकती है ।

❇️ कार्डियो श्वसन संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव :-

  • हृदय गति में वृद्धि 
  • रक्त प्रवाह में वृद्धि 
  • रक्त दाव में वृद्धि 
  • हृदय दर में कमी 
  • आघात आयतन व हृदय निकास में वृद्धि 
  • हृदय के आकार व वजन में वृद्धि 
  • धमनियों व महाधमनियों के व्यास में वृद्धि 
  • रक्त दाव में कमी 
  • शीघ्रक्षति पूर्ति दर 
  • हृदय रोगों का जोखिम कम 
  • दृढ़ इच्छा शक्ति 
  • टाइडल वायु की क्षमता में वृद्धि 
  • श्वसन क्रिया दर में कमी 
  • डायाफ्राम और मांसपेशियों में मजबूती 
  • दूसरे श्वास में देरी
  • बीमारियों से बचाव 
  • सहन शक्ति में वृद्धि 
  • असक्रिय वायु कोष्ठिकाएँ सक्रिय होना 
  • सहन शक्ति में वृद्धि 
  • अवशिष्ट वायु के आयतन में वृद्धि 
  • फेफड़ों और छाती के आकार में वृद्धि 
  • प्राणधर क्षमता में वृद्धि

❇️ कॉर्डियोश्वसन संस्थान पर व्यायामों से होने वाले प्रभाव :-

🔶 हृदय गति का बढ़ना :- जब कोई व्यक्ति व्यायाम करना प्रारम्भ करता है तो व्यायाम की प्रबलता के अनुरूप ही हृदय की गति बढ़ जाती है ।

🔶 स्ट्रोक आयतन में वृद्धि :- व्यायाम की तीव्रता तथा अवधि के बढ़ने के अनुरूप ही प्रत्येक धड़कन पर हृदय के बाएँ निलय से निकलने वाले रक्त की मात्रा ( Stroke Volume ) में वृद्धि होती है ।

🔶 रक्त का आयतन :- व्यायाम की तीव्रता तथा अवधि के अनुरूप ही हृदय द्वारा प्रति मिनट पम्प किए गए रक्त के आयतन ( Cardiac Volume ) में भी वृद्धि होती है ।

🔶 ऊतकों को रक्त की आपूर्ति बढ़ाना :- ऑक्सीजन की तत्काल आवश्यकता होती है तो हृदयवाहिनी संस्थान उन ऊतकों में रक्त के बहाव को बढ़ा देती है व जिनमें कम आवश्यकता होती है उनमें कम कर देता है ।

🔶 रक्त चाप में वृद्धि :- रक्त की आपूर्ति के कारण , रक्तचाप में वृद्धि होती है ।

🔶 प्राणाधार वायु की क्षमता में वृद्धि :- व्यायाम करने से व्यक्ति में आक्सीजन ( वायु की क्षमता में लगभग 3500 सीसी से बढ़कर 5500 सीसी हो जाती है ।

🔶 अवशिष्ट वायु के आयतन में वृद्धि :- नियमित व्यायाम से अवशिष्ट की मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है ।

🔶 असक्रिय वायु – कोशिकाएँ :- सक्रिय हो जाती है नियमित व्यायाम के दौरान O2 को अधिक मात्रा की कर पड़ती है ।

🔶 मिनट आयतन घटना :- एक मिनट में ली गई ऑक्सीजन की मात्रा में भी कमी आती है क्योंकि वायु कोष्ठिकाओं में गैसों के आदान में सुधार हो जाता है ।

🔶 दूसरे श्वास की स्थिति से छुटकारा :- नियमित व्यायाम करने से दूसरे श्वास की आवश्यकता समाप्त हो जाती है ।

🔶 सहन क्षमता में वृद्धि :- यदि लंबी अवधि व्यायाम किया जाए तो व्यक्ति की सहन शक्ति में वृद्धि हो जाती है , कोई भी कार्य बिना थके लंबे समय तक किया जा सकता है ।

❇️ माँसपेशीय संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव :-

🔹 माँसपेशीय , एक विशिष्ट ऊतक है । शरीर और इसके अंगो को गति देता है तथा हमारे शरीर को आकार देती है ।

❇️ व्यायाम का मांसपेशीय तन्त्र पर प्रभाव :-

  • मांसपेशीयां का आकार बढ़ता है ।
  • कंकाल पेशी अतिवृद्धि 
  • मांसपेशीयों की अधिक ऊर्जा की पूर्ति 
  • प्रतिक्रिया समय में सुधार 
  • कोशिका नलिकाओं का निर्माण 
  • वसा में कमी 
  • मांसपेशीय सहन क्षमता में वृद्धि 
  • आसन विकृतियों में सुधार 
  • अतिरिक्त वसा पर नियंत्रण 
  • थकान में देरी 
  • पोषक तत्व भंडारण में वृद्धि 
  • शक्ति तथा गति

❇️ मांसपेशी संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव :-

🔶 मांसपेशीय अतिवृद्धि :- लगातार व्यायाम करने से पेशीय आकार में वृद्धि होती है ।

🔶 कोशिका नलिकाओं का निर्माण :- प्रशिक्षण के कारण पेशियों में कोशिका नलिकाओं की संख्या में वृद्धि हो जाती है । जिस कारण पेशियों का रंग गहरा लाल हो जाता है ।

🔶 अतिरिक्त वसा पर नियंत्रण :- नियमित व्यायाम करने से अतिरिक्त वसा पर नियंत्रण होता है । व्यायाम कैलोरीज घटाने में मदद करते है । जो वसा के रूप में जमा हो जाती है ।

🔶 थकान में देरी :- नियमित व्यायाम थकान में देरी करते है । यह थकान कार्बन डाइ आक्साइड , लैक्तिक एसिड और फास्फेट एसिड के कारण होती है ।

❇️ फास्ट ( सफेद ) ट्विच तन्तु :-

🔹 ऐसे तन्तु जो कि गति क्रियाओं के लिए जाने जाते हैं । ऐसे तन्तु जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में भी कार्य ( ऊर्जा ) करते हैं ।

❇️ स्लो ( लाल ) ट्विच तन्तु :-

🔹 यह सहनशक्ति क्रियाओं के लिए जाने जाते हैं । ऐसे तन्तु जो ऑक्सीजन की उपस्थिति में ही कार्य ( ऊर्जा ) करते हैं ।

❇️ नियमित व्यायाम करने से माँयपेशियों पर पड़ने वाले प्रभाव :-

  • माँसपेशियों का आकार बढ़ता है 
  • कंकाल पेशी अतिवृद्धि 
  • माँसपेशियों को अधिक ऊर्जा की पूर्ति 
  • प्रतिक्रिया समय में सुधार 
  • कोशिका नलिकाओं का निर्माण 
  • वसा में कमी 
  • माँसपेशीय सहन क्षमता में वृद्धि 
  • आसन विकृतियों में सुधार 
  • अतिरिक्त वसा पर नियंत्रण 
  • थकान में देरी 
  • पोषक तत्व भंडारण में वृद्धि 
  • शक्ति तथा गति में वृद्धि

❇️ बुढ़ापे के कारण शरीर क्रियात्मक परिवर्तन :-

🔹 वृद्धावस्था / बुढ़ापा उम्र की वह अवस्था है जिसमें अंगों व तन्त्रों की कार्यक्षमताओं में अत्यन्त धीमी गति से गिरावट आती है ।

  • मांसपेशियों के तनाव , लम्बाई , आकार व शक्ति में कमी 
  • अस्थि घनत्व में कमी 
  • श्वसन प्रणाली की क्षमता में कमी 
  • तन्त्रिका / स्नायु तन्त्र में शिथिलता 
  • उपापचय दर में कमी 
  • हृदय वाहिका तन्त्र की क्षमता में कमी 
  • पाचन तन्त्र की क्षमताओं में कमी 
  • उत्सर्जन तन्त्र की क्षमताओं में कमी 
  • ज्ञानेन्द्रियों की क्षमताओं में कमी 
  • लचक में कमी

❇️ खेल चोटें :-

🔹 खेलों में अभ्यास प्रशिक्षण या स्पर्धा के दौरान , खिलाड़ियों को लगने वाली खेल चोटें कही जाती है ।

🔹 खेल चोटे , खेलों में खेलते समय , शारीरिक कियाकलाप के दौरान घटने वाली दुर्घटनाऐ या परिस्थिति है जिससे खिलाडियों में खेलों में भाग लेने की स्थिति नहीं रहते या काम करने की क्षमता में कमी आ जाता है । इस स्थिति को भी खेल चोटे कहा जाता है ।

❇️ खेल चोटों का वर्गीकरण :-

🔶 बाहरी चोटें :-

🔹 कोमल / मुलायम उत्तक चोटे  

  • रंगड 
  • गुमचोट
  • विदारण फटना 
  • चीरा 

🔶 आंतरिक चोटें :-

🔹 कोमल / मुलायम उत्तक

  • मोच
  • खिंचाव

🔹 कठोर उत्तक चोटे

    • निचले जबड़े का विस्थापन 
    • कंधे के जोड़ का विस्थापन 
    • कुल्हे के जोड़ का विस्थापन 
    • कलाई के जोड़ का विस्थापन 
  • अस्थिभंग ( fracture ) 
    • तनाव अस्थिभंग 
    • कच्चा अस्थिभंग 
    • बहुखण्ड़ अस्थिभंग
    • अनुप्रस्थ अस्थिभंग 
    • तिरछा अस्थिभंग 
    • पच्चड़ी अस्थिभंग 
  • अतिप्रयोग 
    • टेनिस एल्बों 
    • टेंडेनाइटिस 
    • पिंडली की चोट 
    • कँधें की चोट

❇️ खेल चोटों से बचाव :-

  • शरीर को गरमानें का उचित अभ्यास 
  • समुचित अनुकूलन
  • बचावकारी खेल उपकरण और साज – समान 
  • उचित विधियों का प्रयोग  
  • खेल कौशल का सही ज्ञान 
  • शरीर का उचित शीतलीकरण 
  • खेल – कूद का समुचित वातावरण 
  • खेल चोटों का प्रबंध 
  • खेल अधिकारियों का व्यवहार 

❇️ चोटों का प्रबंधन :-

🔶 मुलायम या कोमल उतको की चोटों का प्रबंधन :-

🔹 PRICE ( प्राइस थेरेपी ) 

  • P – Protection सुरक्षा 
  • R – Rest आराम 
  • I – Ice बर्फ 
  • C – Compression दबाव 
  • E – Elevation ऊपर उठाना

🔹 REST ( आराम थेरेपी )

  • R – Rest आराम 
  • E – Elevate ऊत्थान 
  • S – Support सहारा देना 
  • T – Tight सहारे के साथ बांधना ।

🔹 MICE Therapy ( माइस थेरेपी ) 

  • M – Mobilisation गतिशीलता 
  • I – Ice बर्फ 
  • C – Compression दबाब
  • E – Elevation ऊपर उठाना

🔶 जोड़ों की चोट का प्रबंधन :-

🔹 REST 

  • R – Rest 
  • E – Elevate 
  • S – Support 
  • T – Tight

🔹 PRICE 

  • P Protection रक्षण 
  • R- Rest आराम 
  • I – Ice बर्फ 
  • C – Compression दाब ( खून निकलने की परिस्थिति )
  • E – Elevation ऊपर उठाना

❇️ कोमल उत्तकों :-

🔹 कोमल उतकों , त्वचा , मांसपेशीय – स्नायु बंध ( Tendons ) एवं उत्तकों में लगने वाली चोटें को कोमल उत्तक चोटें कहते हैं ।

❇️ कोमल उत्तकों से बचाव :-

  • शरीर को खेल गतिविधियों में भाग लेने से पहले अच्छी तरफ से गर्माना चाहिए । 
  • उचित अनुकूल करना चाहिए । 
  • अच्छी गुणवता वाले उपकरण व सुविधाऐं का प्रयोग करना चाहिए ।
  • खेल मैदान या कोर्टस साफ व समतल होने चाहिए । 
  • खिलाड़ियों को खेलों के नियमों की जानकारी होनी चाहिए । 
  • प्रतियोगिता और प्रशिक्षण के समय खिलाड़ी सतर्क रहना चाहिए । 
  • थकावट , बीमारी व रोगों की दशा में खेलों में भाग नहीं ले चाहिए ।

❇️ जोड़ों का विस्थापन :-

🔹 जोड़ो का विस्थापन या Dislocation एक मुख्य चोट है । वास्तव में , यह जुड़ी हुई अस्थियों के जोड़ की सतहों का विस्थापन है । 

❇️ जोड़ों के विस्थापन के प्रकार :-

🔹 विस्थापन निम्न प्रकार के होते हैं

🔶 निचले जबड़े का विस्थापन :- सामान्यतया यह तब हो जाता है , जब ठोड़ी किसी वस्तु से टकरा जाए । अधिक मुँह खोलने से भी निचले जबड़े का विस्थापन हो सकता है ।

🔶 कंधे के जोड़ का विस्थापन :- कंधे के जोड़ का विस्थापन अचानक झटके या कठोर सतह पर गिरने से भी हो सकता है । इस चोट में ह्यूमरस का सिरा सॉकेट से बाहर आ जाता है ।

❇️ विस्थापन के लक्षण :-

  • बेरंग 
  • सृजन 
  • कुरूप 
  • गतिशीलता में कमी 
  • तीव्रता से दर्द 
  • वजन लेने में असमर्थ

❇️ विस्थापन से बचने के उपाय :-

  • किसी भी शारीरिक क्रिया खेल से पहले उचित ढंग से शरीर को गर्मा लेना चाहिए । 
  • तैयारी काल में उचित अनुकूलन करना चाहिए । 
  • गर्माने में खिचाव वाले व्यायाम शामिल करने चाहिए । 
  • अनुचित खेल सुविधाओं का अभाव खिलाड़ियों के आपसी मजाक नहीं करना चाहिए । 
  • बिना प्रशिक्षक के ज्यादा भार वाली क्रियाओं को नहीं करना चाहिए ।
  • थकावट के होने पर खेल रोक देना चाहिए असंतुलित आहार से बचना चाहिए ।
  • बिना नियमों के खेलने से बचना चाहिए कूलिंग डाउन करनी चाहिए ।

❇️ प्राथमिक चिकित्सा :-

🔹 प्राथमिक चिकित्सा ” एक ऐसी चिकित्सा है जो आपातकालीन व दुर्घटना के समय डॉक्टर के पहुँचने से पहले घायल व्यक्ति को अस्थाई तौर पर दर्द से आराम के लिए दी जाती है । 

❇️ प्राथमिक चिकित्सा का लक्ष्य जान बचाना :-

  • बीमारी और दर्द से आराम दिलवाना ।
  • घायल और बीमार व्यक्ति को संभालने की कोशिश करना ।
  • पुनः शक्ति प्राप्ति की कोशिश करना ।

❇️ तेजी से चिकित्सा उपलब्ध करवाना :-

  • चिकित्सक 
  • उपकरण 
  • सुविधाऐ 
  • विशेष सेवाऐं  व्यक्तिगत , मनोविज्ञानिक आदि।
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