Class 9 Economics Chapter 1 पालमपुर गाँव की कहानी Notes In Hindi

9 Class Economics Chapter 1 पालमपुर गाँव की कहानी Notes In Hindi The Story of Village Palampur

TextbookNCERT
ClassClass 9
SubjectEconomics
Chapter Chapter 1
Chapter Nameपालमपुर गाँव की कहानी
The Story of Village Palampur 
CategoryClass 9 Economics Notes in Hindi
MediumHindi

Class 9 Economics Chapter 1 पालमपुर गाँव की कहानी Notes In Hindi जिसमे हम पालमपुर गाँव के बारे में विस्तार से पड़ेंगे ।

Class 9 Economics Chapter 1 पालमपुर गाँव की कहानी The Story of Village Palampur Notes In Hindi

📚 अध्याय = 1 📚
💠 पालमपुर गाँव की कहानी 💠

नोट :- पालमपुर एक काल्पनिक गाँव है जिसको पाठ का मूल आधार बनाया गया है ।

❇️ पालमपुर गाँव का परिचय :-

🔹 पालमपुर में कृषि ही प्रमुख उत्पादन प्रक्रिया है । गाँव में 450 परिवार रहते है । 150 परिवारों के पास , खेती के लिए भूमि नहीं है । बाकी 240 परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले छोटे भूमि के टुकड़े हैं । 

🔹 गांव की कुल जनसंख्या का एक तिहाई भाग दलित या अनुसूचित जातियों का है । इनके घर गांव के एक कोने में छोटे घर होते हैं जो कि मिट्टी और फूस से होते हैं । 

🔹 गाँव में ज़्यादातर भूमि के स्वामी उच्च जाति के 80 परिवार है । उच्च जाति के मकान ईट और सीमेंट के बने हुए हैं ।

🔹 पालम पुर गांव में शिक्षा के लिए – एक हाई स्कूल दो प्राथमिक विद्यालय , एक स्वास्थ्य केन्द्र और एक निजी अस्पताल भी है । 

❇️ मुख्य उत्पादन गतिविधियाँ :-

🔹 गांव के कुल कृषि क्षेत्र के केवल 40 प्रतिशत भाग में सिंचाई होती है । अधिक उपज पैदा करने वाले बीज ( HYV ) की सहायता से गेहूँ की उपज 1300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 3200 किलोग्राम हो गई है । 

🔹 पालम पुर गांव में 25 प्रतिशत लोग गैर कृषि कार्यो में लगे हुए हैं जैसे डेयरी दुकानदारी , लघुस्तरीय निर्माण , उद्योग , परिवहन इत्यादि ।

❇️ गैर कृषि क्रियाएँ :-

🔹 अन्य उत्पादन गतिविधियों में जिन्हें गैर कृषि क्रियाएँ कहा गया है ‘ लघु विनिर्माण , परिवहन , दुकानदारी आदि शामिल हैं ।

❇️ उत्पादन :-

🔹 उत्पादन का उद्देश्य या प्रयोजन ऐसी वस्तुएँ और सेवाएँ उत्पादन करना है जिनकी हमें आवश्यकता है ।

❇️ उत्पादन हेतु आवश्यक चीजे :-

🔹 वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन के लिए चार चीजें आवश्यक है :-

🔶 भूमि तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन :- जल , वन , खनिज

🔶 श्रम :- काम करने वाले लोग

🔶 भौतिक पूंजी :- 

  • स्थायी पूंजी :- औजार , मशीन , भवन
  • कार्यशील पूंजी :- कच्चा माल , नकद पूंजी

🔶 ज्ञान एवं उघम  मानव पूंजी

🔶 पहली आवश्यकता है भूमि तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन जैसे जल , वन खनिज की भी आवश्यकता है । 

🔶 दूसरी आवश्यकता है श्रम अर्थात् जो लोग काम करेगें । कुछ उत्पादन क्रियाओं में शिक्षित कर्मियों की भी आवश्यकता है । 

🔶 तीसरी आवश्यकता भौतिक पूंजी :- उत्पादन के समय प्रत्येक स्तर पर काम आने वाली आगतें जैसे इमारतें , मशीनें औजार आदि । इसमें स्थायी और कार्यशील पूंजी दोनों शामिल हैं ।

🔹 औज़ार , मशीन , भवन :- औज़ारों तथा मशीनों में अत्यंत साधारण औज़ार जैसे किसान का हल से लेकर परिष्कृत मशीनें जैसे – जेनरेटर , टरबाइन , कंप्यूटर आदि आते हैं । औज़ारों , मशीनों और भवनों का उत्पादन में कई वर्षों तक प्रयोग होता है और इन्हें स्थायी पूँजी कहा जाता है । 

🔹 कच्चा माल और नकद मुद्रा :- उत्पादन में कई प्रकार के कच्चे माल की आवश्यकता होती है , जैसे बुनकर द्वारा प्रयोग किया जाने वाला सूत और कुम्हारों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली मिट्टी । उत्पादन के दौरान भुगतान करने तथा ज़रूरी माल खरीदने के लिए कुछ पैसों की भी आवश्यकता होती है । कच्चा माल तथा नकद पैसों को कार्यशील पूँजी कहते हैं ।

🔶 एक चौथी आवश्यकता भी होती है मानव पूंजी :- उत्पदन करने के लिये – भूमि श्रम और भौतिक पूंजी को एक साथ करने योग्य बनाने के लिए ज्ञान और उद्यम की आवश्यकता है जिसे मानव पूंजी कहा जाता है ।

🔶 बाजार :- उत्पादित वस्तुओं के अन्तिम उपभोग हेतु प्रतिस्पर्धा के लिये बाजार भी एक आवश्यकत तत्व है ।

❇️ उत्पादन के कारक :-

🔹 उत्पादन भूमि , श्रम और पूँजी को संयोजित करके संगठित होता है , जिन्हें उत्पादन के कारक कहा जाता है ।

❇️ जमीन मापने की ईकाई :-

🔹 1 हेक्टेयर 10,000 वर्ग मी 

❇️ पालमपुर गाँव में कृषि :-

🔹 पालमपुर के लोगों का मुख्य पेशा कृषि उत्पादन है । यहां काम करने वाले लोगों में 75 प्रतिशत लोग अपने जीवनयापन के लिए खेती पर निर्भर है ।

🔹 कृषि ऋतु को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा गया है

🔶 वर्षा ऋतु ( खरीफ़ ) :-

  • अवधि  :- जुलाई – अक्टूबर
  • फसल :- ज्वार , बाजरा , चावल कपास , गन्ना तम्बाकु आदि ।

🔶 शरद् ऋतु ( रबी ) :-

  • अवधि :- अक्टूबर – मार्च 
  • फसल :- गेहुँ , सरसों , दालें , आलु आदि ।

🔶 ग्रीष्म ऋतु ( जायद ) :-

  • अवधि :- मार्च – जून 
  • फसल :- तरबूज , खीरा , फलियाँ सब्जियाँ फूल इत्यादि ।

🔹 बिजली के विस्तार ने सिंचाई व्यवस्था में सुधार हुआ परिणाम स्वरूप किसान दोनों खरीफ़ ( Kharif ) और रबी ( Rubi ) दोनों ऋतुओं की फसल उगाने में सफल हो सके हैं । 

❇️ बहुविघ फसल प्रणाली :-

🔹 एक ही भूमि के टुकड़े से उत्पादन बढ़ाने का तरीका ( एक साल में किसी उत्पन्न करना । पालमपुर के किसान कम से कम दो मुख्य फसल उगाते है , तीसरी फसल के रूप में आलू पैदा कर रहे हैं । 

❇️ खेती करने के तरीके :-

🔶 परम्परागत कृषि :- 

  • कृषि में पारम्परिक बीजों का प्रयोग ।
  • कम सिचांई की आवश्यकता ।
  • उर्वरको के रूप में गाय के गोबर अथवा दूसरी प्राकृतिक खाद का प्रयोग ।
  • पारम्परिक हल का प्रयोग ।
  • कुओं नदी , रहट , तालाब से सिंचाई ।

🔶 आधुनिक कृषि :-

  • कृषि में अधिक उपज देने वाले HYV का प्रयोग ।
  • अधिक सिंचाई की आवश्यकता । 
  • रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग ।
  • मशीनों का प्रयोग । 
  • नलकूपों और पम्पिंग सेट के द्वारा सिंचाई ।

❇️ हरित क्रान्ति :-

🔹 हरित क्रान्ति द्वारा भारतीय कृषकों ने अधिक उपाज वाले बीजो ( HYV के द्वारा गेहुँ और चावल की खेती करना सीखा ।

❇️ हरित क्रान्ति से भारतीय कृषि पर पड़े प्रभाव :-

  • हरित क्रान्ति ने भारतीय कृषकों को ज्यादा उपज वाले बीज HYV के द्वारा चावल और गेहूँ की कृषि करने के तरीके सिखाये । 
  • परम्परागत बीजों की तुलना में HYV अधिक उपज वाले बीज सिद्ध हुए ।
  • किसानों ने कृषि में ट्रेक्टर और फसल काटने की मशीनों का उपयोग करना प्रारम्भ कर दिया । 
  • रसायनिक खादों का प्रयोग करना शुरू किया । 
  • प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया गया ।

❇️ हरित क्रान्ति से मृदा को नुकसान :-

  • रासायनिक उर्वरकों के कारण मृदा की उर्वरता नष्ट होने लगी । 
  • भू – जल के अति प्रयोग से भौमजल स्तर ( भूमि जलस्तर ) गिरने लगा । 
  • रासायनिक उवर्रक आसानी से पानी में घुलकर मिट्टी से नीचे चले जाते हैं और जल को दुषित करते हैं । 
  • ये बैक्टीरिया और सूक्ष्य जीवाणु नष्ट कर देते हैं जो मिट्टी के लिए उपयोगी हैं उर्वरकों के अति प्रयोग से भूमि खेती के योग्य नहीं रहती ।
  • अनेक क्षेत्रों में हरित क्रान्ति के कारण उर्वरकों के अधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता कम हो गई । 
  • इसके अतिरिक्त नलकूपों से सिंचाई के कारण भौम जल स्वर कम हो गया और प्रदुषण की बढ़ गया ।

❇️ पालमपुर में भूमि का वितरण :-

🔹 पालमपुर में 450 परिवारों में से लगभग एक तिहाई अर्थात् 150 परिवारों के पास खेती के लिये भूमि नहीं हैं जो अधिकाशत : दलित है । 

🔹 240 परिवारों जिनके पास भूमि नहीं है 2 हेक्टेयर से भी कम क्षेत्रफल वाले टुकड़ों पर खेती करते हैं ।

🔹 8 के ऐसे टुकड़ों पर खेती करने से किसानों के परिवार को पर्याप्त आमदनी नहीं होती । 

🔹 पालमपुर में मझोले किसान और बड़े किसानों के 60 परिवार हैं जो 2 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर खेती करते है । 

🔹 कुछ बड़े किसानों के पास 10 हेक्टेयर या इससे अधिक भूमि है ।

❇️ पालम पुर गांव में भूमिहीन किसानों का संघर्ष :-

  • भूमिहीन किसान दैनिक मज़दूरी पर काम करने के लिये मजबूर है । 
  • उन्हें अपने लिए प्रतिदिन काम ढूंढते रहना पड़ रहा है । 
  • सरकार द्वारा मज़दूर की दैनिक दिहाड़ी न्यूनतम रूप में 60 रू 0 निर्धारित की गई है । 
  • परन्तु केवल मात्र 35-40 रुपये ही मिलते है । 
  • खेतिहर श्रमिकों में अधिक स्पर्धा के कारण ये लोग कम वेतन में भी कार्य करने के लिए तैयार हो जाते हैं । 
  • खेतीहर श्रमिक कर्ज के कारण अत्याधिक कष्ट झेल रहे हैं ।

❇️ पालमपुर के दुकानदार :-

  • दुकान पर प्रतिदिन की वस्तुओं को थोक रेट पर खरीदते है और गाँव में बेचते है । 
  • पालमपुर में ज्यादा लोग व्यापार ( वस्तु विनियम ) नहीं करते । 
  • गाँव में छोटे जनरल स्टोरो में चाल , गेहूँ चाय , तेल बिस्कुट साबुन , टूथ पेस्ट , बेट्री , मोमबत्ती , कापियां पैन पेनसिल तथा कुछ कपड़े भी बेचते हैं । 
  • कुछ परिवारों ने जिनके घर बस स्टैंड के निकट होते है अपने घर के एक भाग में ही छोटी दुकान खोल ली है । 
  • वस्तुओं के साथ – साथ खाने की चीजे भी बेचते हैं ।

❇️ पालमपुर में गैर कृषि क्रियाएं कौन सी है?

🔹 कृषि का अर्थ होता है खेती करना, वही गैर कृषि क्रिया का अर्थ है वह क्रिया जिसमें कृषि सम्मिलित न हो । जैसे दूध बेचना, खनन कार्य और हस्तशिल्प आदि कार्य ।

🔹 पालमपुर में कार्यशील जनसंख्या का केवल 25% भाग गैर कृषि कार्यों में संलग्न है । 

🔹 पालमपुर में मुख्य गैर कृषि क्रियाएं निम्नलिखित हैं:

🔶 डेयरी :- पालमपुर गांव के लोग भैंस पालते हैं और दूध को निकट के बड़े गांव रायगंज में जहां दूध संग्रहण एवं शीतलन केंद्र खुला हुआ है में बेचते हैं ।

🔶 लघु स्तरीय विनिर्माण :- पालमपुर में भी निर्माण कार्य छोटे पैमाने पर किया जाता है और गांव के लगभग 50 लोग विनिर्माण कार्यों में लगे हुए हैं ।

🔶 कुटीर उद्योग :- गांव में गन्ना पेरने वाली मशीन लगी है। यह मशीनें बिजली से चलाई जाती है । किसान स्वयं उगाए तथा दूसरों से गन्ना खरीद कर गुड़ बनाते हैं और सहायपुर में व्यापारियों को बेचते हैं ।

🔶 व्यापार कार्य :- पालमपुर के व्यापारी शहरों के थोक बाजारों से अनेक प्रकार की वस्तुएं खरीदते हैं तथा उन्हें गांव में लाकर बेचते हैं । जैसे चावल, गेहूं, चाय, तेल-साबुन आदि ।

🔶 परिवहन :- पालमपुर के लोग अनेक प्रकार के वाहन चलाते हैं जैसे रिक्शा, जीप, ट्रैक्टर आदि । यह वाहन वस्तुओं व यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं और इसके बदले में वाहन चालकों को किराए के रूप में पैसे मिलते हैं ।

🔶 प्रशिक्षण सेवा :- पालमपुर गांव में एक कंप्यूटर केंद्र खुला हुआ है इस केंद्र में कंप्यूटर प्रशिक्षण के रूप में दो कंप्यूटर डिग्री धारक महिलाएं भी काम करती हैं । बहुत संख्या में गांव के विद्यार्थी वहां कंप्यूटर सीखने भी आते हैं ।

❇️ पालमपुर में लघुस्तरीय विनिर्माण उद्योग की विशेषताएँ :-

  • सरल उत्पादन विधियों का इस्तेमाल ।
  • पारिवारिक श्रम द्वारा घरों पर काम करना । 
  • श्रमिकों को भी कई बार किराए पर रखा जाता है । 
  • कम लागत पूंजी ।
  • कम समय में तैयार माल ।
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