Karak कारक – परिभाषा , कारक चिह्न , भेद और उदाहरण Karak in Hindi

( Karak ) कारक की परिभाषा ( karak ki paribhasha ) , कारक चिह्न , करक के भेद और उदाहरण Karak in Hindi – हिन्दी व्याकरण

कारक का अर्थ ( meaning of karak )

‘ कारक ‘ शब्द का सामान्य अर्थ हैं ‘ करनेवाला ‘ । व्याकरण में ‘ कारक ‘ शब्द का मतलब है – ‘ क्रिया से संबंध बतानेवाला तत्त्व ‘ । कारक का संबंध किसी – न – किसी रूप में क्रिया से होता है । इस तरह कारक का अर्थ होता है ” संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से यह ज्ञात होता है कि वाक्य के अन्य शब्दों से तथा विशेषत: क्रिया से उसका क्या संबंध है , उसे ‘ कारक ‘ कहते हैं ।

कारक किसे कहते है ? ( karak kise kahate hain )

परिभाषा :- karak ki paribhasha

  • वाक्य में जिसके द्वारा क्रिया की सिद्धि हो , उसे कारक कहते है ।
  • किसी वाक्य में क्रिया के सम्पादन में सहायता करने वाले को कारक कहते है ।
  • जब किसी संज्ञा या सर्वनाम पद का संबंध वाक्य में प्रयुक्त अन्य पदों व क्रिया के साथ जाना जाता है , उसे ‘ कारक ‘ कहते हैं ।
  • संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया तथा वाक्य के अन्य शब्दों के साथ संबंध का पता चलता है , उसे कारक कहते हैं ।

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कारक के भेद ( karak ke bhed )

कारक के आठ भेद हैं :-

  1. कर्ता कारक 
  2. कर्म कारक 
  3. करण कारक 
  4. संप्रदान कारक
  5. अपादान कारक
  6. संबंध कारक 
  7. अधिकरण कारक 
  8. संबोधन कारक

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karak chinh – कारक चिह्न किसे कहते है ?

🔹 कारक सूचित करने के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्यय लगते हैं , उन्हें विभक्ति – प्रत्यय या कारक – चिह्न कहते हैं ।

🔹 शब्दों के आपसी संबंध बताने वाले शब्द कारक चिह्न या विभक्ति कहलाते हैं । इन्हें परसर्ग भी कहते हैं ।

निम्नलिखित तालिका में कारक के आठों भेदों के नाम उनकी कारक – चिह्न सहित दिए गए हैं :-

कारकचिह्न पहचानअर्थ
1. कर्ता कारकनेकिसने , कौनकाम करने वाला
2. कर्म कारककोकिसको , क्याजिस पर काम का प्रभाव पड़े
3. करण कारकसे , के द्वाराकिससे , किसके द्वाराजिसके द्वारा कर्ता काम करें
4. संप्रदान कारकके लिए , कोकिसके लिएजिसके लिए क्रिया की जाए
5. अपादान कारक से ( अलग होना )कहाँ सेजिससे अलगाव हो
6. संबंध कारक का , के , की , रा , रे , रीकिसका , किसकीअन्य पदों से सम्बन्ध
7. अधिकरण कारकमें , परकिसमें , किस पर , कहाँ क्रिया का आधार
8. संबोधन कारकहे !, रे !, अरे ! आदि ।****किसी को पुकारना , बुलाना

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अकारक किसे कहते हैं  ?

🔹 संस्कृत में कारकों की संख्या आठ मानी गयी है , किन्तु हिन्दी भाषा में इन आठ कारकों में से केवल छः को ही कारक माना गया है , क्योंकि इनका क्रिया के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है । शेष दो कारक ‘ सम्बन्ध ‘ तथा ‘ सम्बोधन ‘ को इस आधार पर कारक नहीं माना गया क्योंकि क्रिया के साथ इनका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता । इन्हीं दो कारक ‘ सम्बन्ध ‘ तथा ‘ सम्बोधन ‘ को उपकारक या अकारक कहते हैं ।


Karak in Hindi – कर्ता कारक ( karta karak )

कर्ता कारक किसे कहते है ? ( karta karak kise kahate hain )

परिभाषा :-

🔹 क्रिया को स्वतन्त्र रूप से करने वाले को कर्ता कहते हैं ।

🔹 वाक्य में जिस संज्ञा या सर्वनाम पद के द्वारा क्रिया व्यापार के करने वाले का बोध होता है , वह ‘ कर्ता कारक ‘ कहलाता है ।  

  • जैसे :- ‘ मोहन ने कविता सुनाई । इस वाक्य में कविता सुनाने का काम मोहन कर रहा है , अतः मोहन कर्ता कारक है । कर्ता कारक की विभक्ति या परसर्ग ‘ ने ‘ है ।
  • मोहन कविता पढ़ रहा है । ‘ इस वाक्य में भी ‘ पढ़ने ‘ का काम मोहन ही कर रहा है , अतः मोहन कर्ता कारक है , परंतु यहाँ कर्ता कारक की विभक्ति ‘ ने ‘ का प्रयोग नहीं हुआ । अतः स्पष्ट है कि कर्ता कारक का प्रयोग ‘ ने ‘ विभक्ति के साथ भी हो सकता है तथा इसके बिना भी ।

समास की परिभाषा , भेद और उदाहरण samas in hindi – हिन्दी व्याकरण

( karta karak ) कर्ता कारक को प्रयोग करने के विशेष नियम :-

🔹 ‘ ने ‘ का प्रयोग वर्तमानकाल और भविष्यत काल की क्रिया होने पर नहीं होता । भूतकाल में भी क्रिया के सकर्मक होने पर ही ‘ ने ‘ का प्रयोग होता है । जैसे :-

  1. गीता रोटी बनाती है । ( वर्तमानकाल )
  2. सुधांशु क्रिकेट खेलेगा । ( भविष्यत काल )
  3. हरीश देर तक सोया । ( भूतकाल अकर्मक क्रिया ) 
  4. योगेश ने पाठ याद किया ( भूतकाल सकर्मक क्रिया )

🔹 जब संयुक्त क्रिया के दोनों भाग सर्वनाम हों तो अपूर्ण भूत को छोड़कर अन्य भूतकालों में कर्ता के साथ ‘ ने ‘ विभक्ति का प्रयोग होता है । जैसे :-

  • उसने भोजन करना छोड़ दिया । 
  • मैंने अब कहानी लिखनी शुरू कर दी ।

🔹 जब संयुक्त क्रिया पद के दोनों पक्ष सकर्मक हों तब अपूर्ण भूत को छोड़कर अन्य भूतकालों में कर्ता के बाद ‘ ने ‘ का प्रयोग करना चाहिए । जैसे :-

  • गोपीनाथ ने दिल्ली से किताब मँगायी है । 
  • जानकी ने एक ट्रांजिस्टर खरीदा है ।

🔹 अकर्मक क्रियाओं के साथ ‘ ने ‘ विभक्ति का प्रयोग नहीं होता जैसे :- 

  • तुम सब कुछ पढ़ चुके होगे । 
  • मैं कॉलेज जा चुका हूँ ।

🔹 कर्ता कारक ‘ को ‘ विभक्ति के साथ भी आता है । जैसे :-

  • राम को बाज़ार जाना है । 
  • कविता को कुछ पुस्तकें चाहिएं । 
  • विद्यार्थियों को देश के सम्मान की रक्षा करनी है ।

🔹 असमर्थता का भाव प्रकट करने के लिए कर्ता कारक का बोध कराने के लिए ‘ से ‘ परसर्ग का भी प्रयोग किया जाता है । जैसे :-

  • मोहन से पढ़ा नहीं जाता । ( ‘ मोहन ‘ – कर्ता है ) 
  • दुर्बल भिखारी से चला नहीं जाता । ( ‘ भिखारी ‘ – कर्ता है )

🔹 कर्मवाच्य तथा भाववाच्य में कर्ता के साथ से , द्वारा , के द्वारा का प्रयोग होता है । जैसे :-

  • बच्चे के द्वारा खिलौना तोड़ा गया । ( ‘ बच्चे ‘ – कर्ता है )
  • विद्यार्थियों द्वारा काम किया गया । ( ‘ विद्यार्थियों ‘ – कर्ता है )

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Karak in Hindi – कर्म कारक  ( karm karak )

कर्म कारक किसे कहते है ? ( karm karak kise kahate hain )

परिभाषा :-

🔹 क्रिया के सम्पादन में कर्ता के सर्वाधिक अभीष्ट को कर्म कहते हैं ।

🔹 कर्म कारक :- क्रिया व्यापार से प्रभावित होने वाली वस्तु जिस ‘ संज्ञारूप ‘ से इंगित होती है उसे ‘ कर्मकारक ‘ कहते हैं । 

🔹 वाक्य में जिस संज्ञा या सर्वनाम पद पर क्रिया के व्यापार का फल पड़ता है , वह ‘ कर्म कारक ‘ में होता है । जैसे :-

  • माली ने पौधों को पानी दिया । 
  • सुनीता ने चित्र बनाया ।

🔹 प्रथम वाक्य में ‘ दिया ‘ क्रिया के व्यापार का फल ‘ पौधों ‘ पर पड़ रहा है । इसलिए ‘ पौधा ‘ कर्म कारक में है । कर्म कारक का विभक्ति – चिह्न ‘ को ‘ है ।

🔹 ‘ सुनीता ने चित्र बनाया । ‘ इस वाक्य में ‘ बनाया ‘ क्रिया के व्यापार का फल ‘ चित्र ‘ पर पड़ रहा है , अतः ‘ चित्र ‘ कर्म कारक में है , परंतु यहाँ कर्म कारक की विभक्ति ‘ को ‘ का प्रयोग नहीं हुआ । अतः स्पष्ट है कि ‘ को ‘ विभक्ति के बिना भी कर्म कारक का प्रयोग हो सकता है । 

🔹 कभी – कभी एक वाक्य में दो कर्म भी प्रयुक्त होते हैं । जैसे – ऊपर लिखे प्रथम वाक्य में पौधे तथा पानी दो कर्म है । इसी प्रकार ‘ राम ने पिता जी को पत्र लिखा ‘

🔹 इस वाक्य में ‘ पिता जी ‘ और ‘ पत्र ‘ दोनों कर्म कारक में हैं । वाक्य में दो कर्म वाक्य में दो कर्म होने पर ‘ प्राणी-वाचक कर्म ‘ के साथ ही ‘ को ‘ का प्रयोग होता है । जैसे ऊपर के वाक्य में ‘ पिता जी ‘ प्राणीवाचक कर्म है , अतः उसके साथ ‘ को ‘ का प्रयोग किया गया है , ‘ पत्र ‘ के साथ नहीं । यहाँ ‘ पत्र ‘ मुख्य कर्म है और ‘ पिता जी ‘ गौण

🔹 यदि वाक्य में विभक्तिरहित कर्म हो , तो उसे पहचानने के लिए ‘ क्या ‘ और ‘ कहाँ ‘ प्रश्न करना चाहिए । जैसे :-

  • मामा जी दिल्ली गए । ( कहाँ गए ?  दिल्ली – कर्म ) 
  • लड़का खाना खा रहा है । ( क्या खा रहा है ?  खाना – कर्म )

( karm karak ) कर्म कारक को प्रयोग करने के विशेष नियम :-

🔹 इसका विभक्ति – चिह्न ‘ को ‘ होता है , जैसे :-

  • निश्चयात्मक कर्म के अर्थ में ‘ को ‘ विभक्ति का प्रयोग होता है , जैसे :- 
    • सेठ ने नौकर को निकाल दिया ।
    • श्याम ने राम को पानी पिलाया । 
  • सम्बन्धवाची , अधिकारवाची एवं व्यक्तिवाची कर्म – विधानों में ‘ को ‘ विभक्ति अवश्य रहती है , जैसे :- 
    • माँ पुत्र को बुलाती है । 
    • बाप ने बेटे को अलग कर दिया । 
    • मैं शार्दूल विक्रम गुप्त को जानता हूँ ।
  • बनाना करना , समझना आदि अपूर्ण क्रियाएँ जब सकर्मक हो जाती हैं तब ‘ को ‘ का प्रयोग किया जाता है , जैसे :- 
    • हनुमान ने सुग्रीव को राजा बनवाया ।
    • तुमने उस काम को किया ।
  • कही – कही ‘ को ‘ विभक्ति शून्य में छिपा रहता है , जैसे :-
    • राम एक नौकर ( को ) खोजता है । ( अनिशिचत कर्म )
    • श्याम एक पुस्तक ( को ) ढूंढता है । ( अनिशिचत कर्म )

Karak in Hindi – करण कारक  ( karan karak )

करण कारक किसे कहते है ? ( karan karak kise kahate hain )

परिभाषा :-

🔹 करण :- क्रिया की सिद्धि में कर्ता के प्रमुख सहायक को करण कहते हैं ।

🔹 संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के साधन का बोध होता है , उसे ‘ करण कारक ‘ कहते हैं । 

🔹 करण का शब्दिक अर्थ है साधन । वाक्य में कर्ता जिस साधन या माध्यम से क्रिया करता है अथवा क्रिया के साधन को करण कारक कहते हैं । 

🔹 क्रिया – साधन का बोध कराने वाला संज्ञा – रूप करण कारक कहलाता है ।

🔹 क्रिया को करने में कर्ता जिस साधन की सहायता लेता है , वह ‘ करण कारक ‘ में होता है । जैसे :-

  • बढ़ई ने लकड़ी से मेज़ बनाई ।
  • मजदूर ने फावड़े से मिट्टी खोदी ।

इन वाक्यों में मेज़ बनाने का साधन ‘ लकड़ी ‘ और खोदने का साधन ‘ फावड़ा ‘ है । अतः ‘ लकड़ी से ‘ और ‘ फावड़े से ‘ करण कारक में हैं । 

( Karan karak ) करण कारक को प्रयोग करने के विशेष नियम :-

  • करण कारक का विभक्ति – चिह्न ‘ से ‘ है । 
  • कभी – कभी ‘ से ‘ के स्थान पर ‘ के द्वारा ‘ का प्रयोग भी होता है , जैसे :-
    • समारोह का उद्घाटन मंत्री महोदय के द्वारा हुआ । 
  • ‘ से ‘ विभक्ति का प्रयोग केवल साधन के रूप में ही नहीं किया जाता , अपितु कई अन्य प्रकार से भी होता है । जैसे :-
    • यह कैंसर से मरा है । 
    • पत्र के द्वारा सूचना मिलते ही वह आ गया ।

Karak in Hindi – संप्रदान कारक ( sampradan karak )

संप्रदान कारक किसे कहते है ( sampradan karak kise kahate hain )

परिभाषा :-

🔹 संप्रदान ( सम् + प्रदान ) का शाब्दिक अर्थ है – देना । वाक्य में कर्ता जिसे देता है अथवा जिसके लिए क्रिया करता है , उसे संप्रदान कारक कहते हैं । जब कर्ता स्वत्व हटाकर दूसरे के लिए दे देता है वहाँ संप्रदान कारक होता है ।

🔹 जिस वस्तु के लिए क्रिया की जाती है , उसे सूचित करने वाले संज्ञा के रूप को संप्रदान कारक कहते हैं । 

🔹 क्रिया का विधान जिसके लिए हो , उस वस्तु विशेष का संकेतक शब्द ‘ सम्प्रदान कारक ‘ कहलाता है ।

🔹 जिसके लिए कोई कार्य किया जाए या जिसे कुछ दिया जाए वह पद ‘ संप्रदान कारक ‘ में होता है । जैसे :-

  • पीयूष ने छोटे भाई के लिए खिलौने खरीदे ।
  • बच्चे को खाना दो ।

इन बाक्यों में ‘ छोटे भाई के लिए ‘ तथा ‘ बच्चे को संप्रदान कारक में हैं । 

 ( sampradan karak ) संप्रदान कारक को प्रयोग करने के विशेष नियम :-

🔹 इसका चिह्न ‘ के लिए ‘ है तथा कहीं – कहीं ‘ को ‘ भी सम्प्रदान कारक की विभक्ति का कार्य करता है । जैसे :- 

  • परिणाम या हेतु के अर्थ में ‘ के लिए ‘ का प्रयोग होता है , जैसे :-
    • वह परीक्षाफल के लिए विश्वविद्यालय गया था । 
  • समय – सूचना में ‘ के लिए ‘ विभक्ति का प्रयोग होता है , जैसे :- 
    • चौदह वर्ष के लिए राम जी का वनवास हुआ था ।  
  • अपूर्ण सकर्मक क्रिया के मुख्य कर्म – विधान में ‘ को ‘ का प्रयोग सम्प्रदान के अर्थ में किया जाता , जैसे :- 
    • राधेश्याम पशु को समझदार नहीं मानता । 
    • यह सेठ नौकर को मनुष्य नहीं समझता । 
    • श्री गणेश जी को नमस्कार है ।

Karak in Hindi – अपादान कारक ( apadan karak )

अपादान कारक किसे कहते है ( apadan karak kise kahate hain )

परिभाषा :-

🔹 संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के अलगाव , पृथकता , वियोग , दूर होना , निकलना या तुलना का बोध होता है , उसे अपादान कारक कहते हैं ।

🔹 अपादान का अर्थ है – पृथक होना या अलग होना । संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से एक वस्तु या व्यक्ति का दूसरी वस्तु या व्यक्ति से अलग होने या तुलना करने का भाव हो वहाँ अपादान कारक होता है ।

🔹 जिस पद से अलग होने का भाव प्रकट हो , वह पद ‘ अपादान कारक ‘ में होता है । जैसे :- 

  • वृक्ष से फल गिरा । 
  • रामसिंह गाँव से चला गया । 

🔹 इन बाक्यों में ‘ वृक्ष से ‘ और ‘ गाँव से ‘ अपादान कारक में हैं । 

🔹 अपादान कारक की विभक्ति ‘ से ‘ है । जिन शब्दों से घृणा , द्वेष , भय , तुलना , निकलना , आदि का बोध होता है , वे भी अपादान कारक में होते हैं । जैसे :-

  • मैं गंदगी से घृणा करता हूँ । ( घृणा )
  • अपने साथियों से ईर्ष्या – द्वेष अच्छी बात नहीं । ( ईष्र्ष्या – दुद्वेष )
  • गीदड़ शेर से भय खाता है । ( भय )
  • रवि पंकज से अच्छा है । ( तुलना )
  • गंगा हिमालय से निकलती है । ( निकलना )

Karak in Hindi – संबंध कारक ( sambandh karak )

संबंध कारक किसे कहते है ( sambandh karak kise kahate hain )

परिभाषा :-

🔹 संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ संबंध स्थापित होने का बोध हो , उसे ‘ संबंध कारक ‘ कहते हैं ।

🔹 शब्द का वह रूप जो दूसरे संज्ञा या सर्वनाम शब्दों से संबंध बतलाए , संबंध कारक कहलाता है ।

🔹 क्रिया से भिन्न अव्यय शब्द का बोधक रूप सम्बन्ध कारक कहलाता है ।

🔹 संज्ञा या सर्वनाम का वह शब्द जिससे दूसरे के साथ संबंध ज्ञात हो , ‘ संबंध कारक ‘ कहलाता है । जैसे :-

  • यह हरिशंकर का पुत्र है ।
  • विद्यालय के प्रधानाचार्य परिश्रमी तथा योग्य हैं ।

🔹 इन वाक्यों में ‘ हरिशंकर का ‘ , तथा ‘ विद्यालय के ‘ शब्द संबंध कारक में हैं क्योंकि इनका संबंध क्रमशः ‘ पुत्र ‘ , तथा ‘ प्रधानाचार्य ‘ से है

🔹 संबंध कारक की विभक्ति का , के , की ; ना , ने , नी ; रा , रे , री हैं ।


Karak in Hindi – अधिकरण कारक ( adhikaran karak )

अधिकरण कारक किसे कहते है ( adhikaran karak kise kahate hain )

परिभाषा :-

🔹 वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के आधार का बोध होता है , उसे अधिकरण कारक कहते हैं ।

🔹 क्रियात्मक आधार का अवबोधक कारक अधिकरण कहलाता है ।

🔹 जिस पद से क्रिया के आधार का बोध होता है , वह पद ‘ अधिकरण कारक ‘ में होता है । जैसे :-

  • कमल सरोवर में खिला है ।
  • माता जी घर के भीतर हैं ।

🔹 इन वाक्यों में ‘ सरोवर में ‘ , और ‘ घर के भीतर ‘ पद उन स्थानों को सूचित करते हैं जहाँ क्रिया का व्यापार होता अतः ये अधिकरण कारक में हैं । 

 ( adhikaran karak ) अधिकरण कारक को प्रयोग करने के विशेष नियम :-

🔹 अधिकरण कारक की विभक्तियों में , पर , भीतर , आदि हैं । प्रयोगात्मक रूप में यह अनेक विध मिलता है , जैसे :-

  • सीमा , समय , तुलना , अन्तर आदि का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ‘ में ‘ विभक्ति का प्रयोग किया जाता है । जैसे :- 
    • श्याम कॉलेज में है ।
    • सोहन चार दिन में बनारस जायेगा । 
    • गोरखपुर और फैजाबाद में 135 कि ० मी ० की दूरी है । 
  • निश्चयार्थक और निमित्तार्थक प्रयोगों में भी ‘ में ‘ विभक्ति प्रयुक्त होती है , जैसे :- 
    • कृष्ण गोकुल में पैदा हुए । 
    • हनुमान में राम की छवि देखी जा सकती है । 
  • कालवाची , कारणवाची वाक्यों में ‘ पर ‘ अधिकरण का प्रयोग मिलता है , जैसे :- 
    • समय पर आ जाना । 
    • पढ़ने पर बुद्धि का विकास होगा । 
  • मुहावरेदार प्रयोगों में ‘ पर ‘ विभक्ति का प्रयोग होता है , जैसे :- 
    • कुत्ते पर विश्वास होता है । 
    • बाघ पर संदेह रहता है । 

Karak in Hindi – सम्बोधन कारक ( sambodhan karak )

सम्बोधन कारक किसे कहते है ( sambodhan karak kise kahate hain )

परिभाषा :-

🔹 वाक्य में जब किसी संज्ञा को पुकारा जाए अथवा संबोधित किया जाए उसे संबोधन कारक कहते हैं । संबोधन में पुकारने , बुलाने एवं सावधान करने का भाव होता है ।

🔹 संज्ञा के जिस रूप से बुलाने अथवा पुकारने का बोध हो , उसे सम्बोधन कारक कहते हैं । 

🔹 शब्द के जिस रूप से किसी को पुकारा जाए , वह ‘ संबोधन कारक ‘ में होता है । जैसे :-

  • अरे बेटा ! तुम कहाँ खो गए थे ? 
  • हे विद्यार्थियो ! देश का भविष्य तुम्हीं पर निर्भर है । 

🔹 इन वाक्यों में ‘ अरे बेटा ‘ , ‘ हे विद्यार्थियो ‘ संबोधन के रूप में हैं । संबोधन कारक में अन्य कारकों की अपेक्षा विशेष बात यह है कि इसमें संज्ञा शब्दों के पूर्व कभी – कभी अव्यय शब्दों ( जैसे :- अरे , है , अजी , ओ , आदि ) का प्रयोग होता है । 

🔹 कभी – कभी बिना अव्यय शब्दों के भी संबोधन कारक होता है । जैसे :- 

  • बच्चो ध्यान से सुनो । 
  • भाइयो और बहनो मातृभूमि तुम्हें पुकार रही है ।

🔹 संबोधन कारक में संज्ञा शब्दों के बाद संबोधन चिह्न ( ! ) भी लगाया जाता है ।


अकारक पद के क्षेत्र में सम्बन्ध तथा सम्बोधन पदों की क्या विशेषता है ? 

🔹 संस्कृत में कारकों की संख्या आठ ( कर्ता , कर्म , करण , संप्रदान , अपादान , सम्बन्ध , अधिकरण , सम्बोधन ) मानी गयी है । वास्तव में सम्बन्ध और सम्बोधन को कारक मानने का कोई अर्थ नहीं है ; क्योंकि इनका क्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं रहता । 

🔹 अर्थ की दृष्टि से देखा जाय तो कारकों की यही संख्या मध्यकालीन प्राकृत – अपभ्रंश तथा आज की हिन्दी में है । हाँ विकारक ( केस ) तथा अकारक की दृष्टि से इनकी संख्या घटकर दो या तीन रह गयी है । इस प्रकार क्रिया के संदर्भ में शब्द के अर्थ को इंगित करने वाला हुआ – कारक तथा शब्द के रूप में हुए विकार को सूचित करने वाला हुआ – विकारक ।

कर्म और संप्रदान कारक में अंतर :- 

🔹 कर्म कारक और संप्रदान कारक दोनों में ‘ को ‘ विभक्ति का प्रयोग होता है । कर्म कारक में जिस शब्द के साथ ‘ को ‘ जुड़ा होता है , उस पर क्रिया का फल पड़ता है । जैसे :-

  • सुरेंद्र ने महेंद्र को पढ़ाया । ( पढ़ाया क्रिया का कर्म )

🔹 संप्रदान कारक के चिहून ‘ को ‘ का अर्थ ‘ के लिए ‘ या ‘ के वास्ते ‘ होता है । संप्रदान कारक में किसी को कुछ देने या किसी के लिए कुछ काम करने का बोध होता है । जैसे :-

  • गरीबों को भोजन और वस्त्र दे दो । ( गरीबों के लिए / के वास्ते )
  • यहाँ पढ़ने को पुस्तकें नहीं मिलतीं । ( पढ़ने के लिए / के वास्ते ) 

🔹 संप्रदान कारक में ‘ देने ‘ या ‘ उपकार ‘ करने का भाव मुख्य होता है ।

करण और अपादान कारक का अन्तर स्पष्ट कीजिए । 

🔹 करण कारक और अपादान कारण दोनों में ‘ से ‘ पर सर्ग का प्रयोग होता है । जहाँ साधन के अर्थ में ‘ से ‘ का प्रयोग हो वहाँ करण कारक तथा जहाँ किसी प्रकार का अलगाव का भाव प्रकट हो वहाँ अपादान कारक होता है । जैसे :- 

  • छात्र बस से विद्यालय गये । ( करण ) 
  • छात्र विद्यालय से वापस आये । ( अपादान ) 

🔹 उपर्युक्त उदाहरणों में पहले वाक्य में बस विद्यालय जाने का साधन है अतः ‘ से ‘ यहाँ करण कारक है । दूसरे वाक्य में छात्र विद्यालय से अलग हैं अतः यहाँ ‘ से ‘ अपादान कारक है ।

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